सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०० सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
हिन्दी—संसार को प्रायः कामोपभोग में लीन तथा मोक्ष से विमुख देखकर
मुक्ति को ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समझते हुए, मैंने इस काव्य में यथार्थ वस्तु का ही
उपदेश दिया है। ऐसा समझकर सावधानीपूर्वक इसमें से शान्तिदायक वस्तु को ही
ग्रहण करना चाहिए, न कि मनोरंजक वस्तु को ग्रहण करना चाहिए। जैसे कि धातु
के कणों से धूलि झाड़कर लोग प्रयोजनीय सोने को ग्रहण करते हैं ॥ ६४ ॥
॥ सौन्दरनन्द-महाकाव्य में 'आज्ञाव्याकरण' नामक अष्टादशसर्ग समाप्त ॥ १८ ॥
बेगूसरायनगरस्य प्राध्यापकानामुपनगरवासिना व्याकरण-साहित्याचार्यद्युपाधिना
डॉक्टर-जगदीशचन्द्रशर्मणा प्रणीते सौन्दरनन्दमहाकाव्ये 'विमला'
व्याख्यानं सम्पूर्णम् ।
व्योमाङ्कनिधिचन्द्रेऽब्दे तपसि बाणबुधे सिते ।
ख्रिष्ट्राब्दस्य वसन्ते व्याख्येयं लिखिता मया ॥