सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 428, कुल 496 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 428

३७४ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
सम्यक्तया लब्धज्ञानिनम्, दशबलिनम् = एतन्नामानम्, भिषक्प्रधानम् = भवबन्धन-
रोगापहारिणम्, त्रातारम् = रक्षकम्, वन्दे = प्रणमामि, तम् = देवम्, पुनः अपि = भूयः
अपि, सन्नतः = श्रद्धाभारेण विनतकन्धरः, च अस्मीति शेषः ॥ ७३ ॥
हिन्दी—उस देव-विशेष को जो समस्त प्राणियों के प्रकृति, गुण तथा आशय को
जानने वाले, मनुष्यों के हृदयस्थित विचारों को जानने वाले, परमकारुणिक अर्थात्
अहिंसा को परमधर्म मानने वाले, महर्षि बुद्ध, दशबली, भवरोगचिकित्सक तथा सर्व-
जनरक्षक को मैं प्रणाम करता हूँ और 'उस देव को पुनः मैं' झुककर प्रणाम करता
हूँ ॥ ७३ ॥
सौन्दरनन्द-महाकाव्य में 'अमृत-प्राप्ति' नामक सप्तदश सर्ग समाप्त ॥ १७ ॥