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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

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२८६ सौन्दरनन्दं महाकाव्यम्
तुल्यम्, न=नहि, रमते=नन्दति, यदि=चेत्, आत्मारामः=स्वीयानन्दः, चरन्=
भ्रमन्, प्रीतिसलिलञ्च=स्नेहजलञ्च, पिबति=पानं करोति, ततः=तत्पश्चात्, त्रिदश-
पतिराज्यादपि—तिस्रः दशाः येषां त्रिदशाः=देवाः, तेषां पतिः=स्वामी, इन्द्रस्तस्य
राज्यम्=साम्राज्यम्, तस्मात्=स्वर्गादपि, श्रेष्ठम्=उत्तमम्, सुखम्=आनन्दम्,
भुङ्क्ते=भोगं करोति ॥ ५२ ॥
हिन्दी—यदि वह सूने घर में सदा अकेला ही आनन्द अनुभव करता है, यदि
क्लेशों के कारणों से वैसे ही दूर रहता है, जैसे दुश्मनों से और यदि अपने आप में
सन्तुष्ट रहता हुआ प्रेमरूपी पानी पीता है तो वह निश्चय ही देवराज के राज्य अर्थात्
स्वर्ग से भी उत्तम सुख का उपभोग करता है ॥ ५२ ॥
सौन्दरनन्द-महाकाव्य में ‘आदिप्रस्थान’ नामक चतुर्दश सर्ग समाप्त ॥ १४ ॥