सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)
Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha
महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा
पृष्ठ 10, कुल 496 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४ )
इस उल्लेख के आधार पर ही इनके जन्मकाल की एक धुंधली रेखा सामने
आती है । अन्यथा आत्मविवेचन के निरभिलाषी इस सहृदय महाकवि ने स्वयं
को परिचय के बन्धन से मुक्त ही रखा है ।
जब सम्राट् अशोक का राज्याश्रय बौद्ध धर्म को मिला तब इसके प्रसार
की गति तीव्रतर हो गई । प्रियदर्शी अशोक ने स्वयं भगवान् बुद्ध के चरणचिह्नों
पर चलना प्रारंभ कर दिया । बौद्ध धर्म की उन्नति का दूसरा कारण दीन-
दुःखियों के प्रति करुणा की भावना, वैदिक धर्म के आभिजात्य का विरोध,
जातिप्रथा, धार्मिक पाखण्ड का खण्डन बौद्ध धर्म के उत्थान में सहायक सिद्ध
हुआ। अशोक के बाद बौद्ध धर्म को दूसरा प्रबल राज्याश्रय कुषाण वंश के
प्रसिद्ध राजा कनिष्क से मिला । गान्धार और कम्बोज से कलिङ्ग, आन्ध्र-
प्रदेश, कश्मीर तथा हिमालय प्रदेश से अवन्ती एवं अश्मक ( वर्त्तमान
खानदेश ) आदि तक के देशों का अश्वघोष के साहित्य में उल्लेख मिलता है ।
लङ्का और जावा देशों के सम्बन्ध में भी अश्वघोष को पर्याप्त ज्ञान था । इनके
साहित्य में आर्यावर्त्त के कई प्रसिद्ध नगरों के भी उल्लेख मिलते हैं । हिमालय,
गंगा और कोशी नदी का भी उल्लेख मिलता है । लंका, चीन, जावा, श्याम,
सुमात्रा प्रभृति देश तो बौद्धों का गढ़ बन गया था । गुप्तकाल में बौद्ध और
अन्य पन्थों में जमकर संघर्ष चलता रहा । प्रत्येक पन्थ अपने प्रचार के लिए
सभी प्रकार के साधनों का उपयोग करना चाहता था । अश्वघोष ने इसी
कारण से बुद्धचरित एवं सौन्दरनन्द की रचना की है ।
इस प्रसंग में यह भी उल्लेखनीय है कि विजयेच्छु कनिष्क ने मगध की
राजधानी पाटलिपुत्र पर भी आक्रमण कर उसे अपने अधिकार मे ले लिया था ।
इस आक्रमण में मगधनरेश को बन्दी बना लिया गया था । पराजित मगधनरेश
से कनिष्क ने अश्वघोष को प्राप्त किया था । इस सम्बन्ध में विशेष विवरण के
लिए द्रष्टव्य है—डा० रामनारायण द्विवेदी : 'बौद्ध संस्कृत-काव्य-समीक्षा'
—पृ० १३६-३७ ।
अश्वघोष का काल और जीवनवृत्त
आत्मश्लाघा-विरहित संस्कृत के अन्य कवियों की तरह अश्वघोष का
स्थितिकाल एवं जीवनवृत्त बिलकुल अज्ञात नहीं है । ये संस्कृत भाषा के उन
गिने-चुने कवियों में हैं, जिनके स्थितिकाल के सम्बन्ध में विद्वानों में अधिक
मतभेद नहीं है । विशेषतः बौद्धग्रन्थों ने अश्वघोष के विषय में आवश्यक
जानकारी को सुरक्षित रखा है तथा उनके ग्रन्थों को भी मूल तथा अनुवाद
के रूप में बचा रखा है । ये सुप्रसिद्ध सम्राट् कनिष्क के समकक्ष थे—इस विषय
में प्रायः सभी विद्वान् एकमत हैं । कुछ बौद्ध किवदन्तियों के द्वारा अन्य सम-
सामयिक बौद्ध व्यक्तित्वों का अश्वघोष के साथ ही समीकरण किया गया है ।