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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

२६ सात्वतसंहिता
विभज्य वामदेशेन दक्षिणेनाङ्घ्रिणा ततः ।
शनैः शनैः प्रविश्यान्तः ................. ॥ (२।१४-१५) इति ।
अन्ये चात्र तत्र तत्रापेक्षिता बहवो विशेषा एतदुपबृंहणयोरीश्वरपारमेश्वरयोरेव
संगृहीता ग्राह्याः ॥ ४४-४५ ॥
शुद्ध वस्त्र धारण करे और इन्द्रियों को वश में कर चित्त को स्थिर रखे ।
फिर मौन धारण कर पुष्प दर्भादि से द्वार के अग्रभाग में स्थित चक्र सहित गरुड
की पूजा कर भगवान् के मन्दिर में प्रवेश करे ॥ ४४-४५ ॥
उपार्जितं पुरा यद्वै यागोपकरणं महत् ।
तत्सर्वं दक्षिणे कृत्वा वामे तु करकं न्यसेत् ॥ ४६ ॥
गालितेनाम्भसा पूर्णं मध्ये भद्रासनं न्यसेत् ।
मृत्काष्ठोपलधातूत्थमेकद्वित्रिशमं तु वा ॥ ४७ ॥
चतुरश्रमथाष्टाश्रं चतुरश्रायतं तु वा ।
चतुष्पादसमायुक्तं चतुरावरणाङ्कितम् ॥ ४८ ॥
मकरस्यप्रणालं तु प्रमाणेनोपलक्षितम् ।
यागोपकरणानामासादनस्थाननियममाह—उपार्जितमिदमिति सपादेन । गर्भगृह-
मध्ये भद्रपीठस्थापनं तल्लक्षणादिकं चाह—मध्य इत्यादिभिः । एकद्वित्रिशमं तु वा
चतुरङ्गुलमष्टाङ्गुलं द्वादशाङ्गुलं वेत्यर्थः । ‘शमं तु चतुरङ्गुलम्' (३।१।५२) इति
वैजयन्ती ॥ ४६-५० ॥
यज्ञ के निमित्त जो-जो यज्ञोपकरण उपार्जित किया गया है, उसे अपनी
दाहिनी ओर रखे और बाईं ओर करके बायीं ओर करवा (= करक) रखे ॥ ४६ ॥
वह करक वस्त्र से छने हुये पवित्र जल से पूर्ण होना चाहिये तथा इन दोनों
के मध्य में भद्रासन रखे । वह भद्रासन मिट्टी, काष्ठ, पत्थर अथवा धातु से
निर्मित एक शम (चार अङ्गुल), दो शम (आठ अङ्गुल), तीन शम (बारह अङ्गुल)
ऊँचा होना चाहिये । चार कोणों का या आठ कोणों का चौकोर होना चाहिये । वह
भद्रासन, चतुष्पाद तथा चार आवरणों से युक्त होना चाहिये । प्रमाण में वह मकर
के मुख के समान उसका प्रणाल (= नाली) होना चाहिये ॥ ४७-४९ ॥
तदधश्चोत्तरस्यां वै चलं वा क्ष्मातलाश्रितम् ॥ ४९ ॥
शङ्खचक्राङ्कितं कुर्याज्जलाधारं सुलक्षणम् ।
उसके बाद उसके उत्तर दिशा में कुछ नीचे जल अथवा पृथ्वी के आश्रित
शङ्ख चक्राङ्कित सुलक्षण जलाधार स्थापित करे ॥ ४९-५० ॥
अथोपविश्य वै दार्भे काष्ठजे वाऽजिनासने ॥ ५० ॥
बद्धपद्मासनः कुर्यान्न्यासं मन्त्रवरेण तु ।