सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ६०५
यस्माद् देवालयानां च अङ्गणानां विशेषतः ॥ ४२९ ॥
चतुरश्रादिपीठानां नित्यमेव महामते ।
अन्योन्यानुगतत्वं तु हितं सापेक्षकं तु वै ॥ ४३० ॥
भूमिभागवशेनैव तथैवार्चावशेन तु ।
नानाफलवशेनपि तथा शोभावशेन च ॥ ४३१ ॥
वृत्त, आयत, वितत अथवा उक्त लक्षण प्रासाद में जिस कारण से देवालयों
का या अङ्गणों का विशेष कर चौकोर पीठों का, हे महामते ! नित्य ही भूमिभाग
वश से, उसी प्रकार अर्चावश से तथा नाना फल वश से एवं शोभावश से
सापेक्षक अन्योन्यानुगतत्व रहता है । अतः वे हितकारी होते हैं ॥ ४२९-४३१ ॥
भूलाभश्चतुरश्रात् तु चतुरश्रायताद् धनम् ।
वर्तुलात् सर्वकामाप्तिर्निर्वृत्तिस्तु तदायतात् ॥ ४३२ ॥
दृष्टादृष्टफलेप्सूनां लोकास्तु महदादयः ।
यच्छन्ति वैष्णवं स्थानमारोग्यं भूमिमुत्तमाम् ॥
वैष्णवानामकामानां च्युतेरन्ते परं पदम् ॥ ४३३ ॥
॥ इति श्रीपाञ्चरात्रे श्रीसात्वतसंहितायां प्रतिमापीठप्रासादलक्षणं नाम
चतुर्विंशः परिच्छेदः ॥ २४ ॥
चौकोर प्रासाद से भू-लाभ, चतुरश्र और आयत प्रासाद से धन-लाभ, वर्त्तुल
प्रासाद से सर्व कामाप्ति, आयत से निर्वृत्ति प्राप्त होती है । दृष्टादृष्ट फल
चाहने वाले प्रासाद निर्माण कर्त्ताओं को महदादि लोक वैष्णव स्थान देते हैं ।
आरोग्य एवं उत्तम भूमि देते हैं । इतना ही नहीं निष्काम वैष्णवों को मरने के बाद
परम पद देते हैं ॥ ४२९-४३३ ॥
॥ इस प्रकार डॉ० सुधाकर मालवीय कृत सात्त्वत संहिता के प्रतिमापीठप्रासादलक्षण
नामक चौबीसवें परिच्छेद की हिन्दी समाप्त हुई ॥ २४ ॥