सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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द्वौ परस्परवक्त्रौ तु कोणदेशसमाश्रितौ ॥ ४२२ ॥
अपनी इच्छा के अनुसार निर्माण किये जाने वाले दो प्रासादों को उचित
दिशा में निर्माण करावे । परस्पर सटे हुए दो मुख वाले दो प्रासादों को कोण देश
के समाश्रित निर्माण करावे ॥ ४२२ ॥
द्वाराण्यनन्तायतने प्रासादानां महामते ।
यथाभिमतदिक्स्थानि कर्तव्यान्यविशङ्कया ॥ ४२३ ॥
हे महामते ! अनन्तायतन नामक प्रासाद में यथाभिमत दिशा में द्वार निर्माण
करावे, इनमें संदेह किञ्चिन्मात्र भी न करे ॥ ४२३ ॥
न तत्र तेषां भवति वेधदोषः परस्परम् ।
अङ्गभावगतत्वाच्च प्रधानायतनस्य वै ॥ ४२४ ॥
इस प्रकार के प्रासाद निर्माण में कभी भी परस्पर वेध दोष नहीं लगता ।
क्योंकि वे प्रधानायतन के अङ्गभाव बन जाते हैं ॥ ४२४ ॥
अर्धेन च त्रिभागेन हितः पादेन चाङ्गणात् ।
परण्डकस्य चोच्छ्रायस्तद्विस्तारस्तथोच्छ्रितेः ॥ ४२५ ॥
अङ्गण के आधे अथवा तीन भाग अथवा एक पाद के मान में परण्डक को
ऊँचा निर्माण करे तथा उसका विस्तार उसकी ऊँचाई के अनुसार करे ॥ ४२५ ॥
तच्च पीठोपमं कुर्यात् श्लक्ष्णं सोष्णीषमेव वा ।
युक्तं कोटिगणेनाथ नानादेवान् गणेन तु ॥ ४२६ ॥
उसे पीठ के समान चिकना तथा उष्णीश युक्त बनावे उसे करोड़ों गणों से
युक्त करे ॥ ४२६ ॥
यदेकायतनं चैव त्वङ्गणं तन्महामते ।
युक्तं लघुपरण्डेन केवलं वा परण्डकम् ॥ ४२७ ॥
हे महामते ! जो एक आयतन वाला अङ्गण है उसे लघु परण्डक से युक्त
करे अथवा केवल परण्डक ही निर्माण करे ॥ ४२७ ॥
यदा द्व्यायतनार्थं च द्वादशायतनान्तिकम् ।
एकदिग्विीक्षमाणं च चतुरश्रायतेऽङ्गणे ॥ ४२८ ॥
जब चौकोर अथवा आयत अङ्गण में द्व्रायतन से लेकर द्वादशायतन हो, तब
उसे एक दिशा की ओर देखते हुए निर्माण करावे ॥ ४२८ ॥
वृत्तायते वा वितते प्रासादे चोक्तलक्षणे ।