सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 648, कुल 837 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 648

चतुर्विंशः परिच्छेदः ५८९
चाहिये । यदि राजा सामर्थ्यवान हो तब मिट्टी के कलश से दूने मान में सोना
और चाँदी का कलश निर्माण करावे, जो उसके लिये हितकारी है ॥ ३०९ ॥
तत्संख्यं चतुरश्रं तु द्वादशाङ्गुलविस्तृतम् ।
तत्र्यंशतुल्यं बाहुल्यात् शिलावृन्दं समाहरेत् ॥ ३१० ॥
संस्थाप्य विधिवत् कुम्भान् पूर्वोक्तेन क्रमेण तु ।
कम्बुतुल्यमथैकं वा तत्कण्ठं त्र्यङ्गुलोन्नतं ॥ ३११ ॥
तद्गुणैरपि विस्तीर्णं तत्खातोऽष्टाङ्गुलः स्मृतः ।
परितः कर्णवर्जं तु शङ्खो वा सुसितो महान् ॥ ३१२ ॥
विहितो जननाथस्तु अन्तःशुद्धस्तु साक्षतः ।
एवं हि सान्तराद् बाह्यात् समालभ्याधिवास्य च ॥ ३१३ ॥
इन कलशों की संख्या भी उतनी ही होनी चाहिये और उनका विस्तार भी
द्वादशाङ्गुल होना चाहिये । शिला भी द्वादश अङ्गुल विस्तार की चौड़ाई, तृतीय अंश
की कलश की संख्या में निर्माण करावे । तदनन्तर उस शिला पर विधिवत् कुम्भों
को स्थापित करे । उसमें एक कलश का कण्ठ शङ्ख के समान उसकी ऊँचाई तीन
अङ्गुल, उसके गुण के अनुसार लम्बाई और उसके भीतरी भाग की गहराई आठ
अङ्गुल बनावे । उसमें कान न बनावे और चारों ओर श्वेत शङ्ख स्थापित करे । इस
प्रकार अन्तःशुद्ध कलश में अक्षत सहित भगवान् को स्थापित करे । इस प्रकार
भीतर से एवं बाहर से स्पर्श कर अधिवासन करे ॥ ३१०-३१३ ॥
फलैर्हेमादिकै रत्नैः सर्वौषधिमयैस्ततः ।
गन्धैर्बीजैस्तथा धान्यैर्विद्रुमाद्यैस्तु मौक्तिकैः ॥ ३१४ ॥
नेत्रवस्त्रैरलङ्कारैर्भूषयेत् स्रग्वरैः शुभैः ।
द्वादशाक्षरमन्त्रेण एकैकस्य समाचरेत् ॥ ३१५ ॥
मूर्तिसंसिद्धये न्यासं प्रणवैस्तच्चिदात्मना ।
ततश्चार्घ्यादिकैर्भोगैर्बल्यन्तैर्विविधैर्यजेत् ॥ ३१६ ॥
फिर एक-एक के लिये फल, होम, रत्न, सर्वौषधि, गन्ध, बीज, धान्य,
विद्रुम, मोती, वेत्र वस्त्र, उत्तमोत्तम माला तथा द्वादशाक्षर मन्त्रों से उनको शोभित
करे । मूर्त्ति की संसिद्धि के लिये प्रणव द्वारा तथा चिदात्मना (चिच्छक्ति) द्वारा
न्यास करे । फिर उनका अर्घ्यादिकों से एवं नाना प्रकार के भोगों से अन्त में
बलिदान से इस प्रकार अनेक प्रकार से पूजन करे ॥ ३१४-३१६ ॥
शिलास्वेवं कृते पश्चाग्निनयेत् कुण्डसन्निधिम् ।
सशिलं कुम्भवृन्दं तु आधारेषु परिन्यसेत् ॥ ३१७ ॥