सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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इसी प्रकार वहाँ से उठाकर सुसंस्कृत विदिक् कुण्डों में स्थापित कर उनका
क्रम से अभ्यर्चन करे । इसके बाद सृष्टि-क्रम से चारों दिशाओं में वासुदेवादि चार
नामों वाले एकायन द्विजों को सन्निविष्ट करे । उनको दिये गये अपनी-अपनी
सामग्रियों से असंख्य कार्य निवेदन करे ॥ ३०१-३०२ ॥
कर्मावसानं हवनं साज्यैस्तु तिलतण्डुलैः ।
एवमप्यययोगेन वाव्वादीशानगोचरम् ॥ ३०३ ॥
ऋग्वेदाद्यांस्तु चतुरः संस्कृत्यादौ तथा न्यसेत् ।
तैरप्यच्युतलिङ्गैस्तु स्वशाखोक्तैश्च पावनैः ॥ ३०४ ॥
हवनं विधिवत् कार्यं भक्तियुक्तेन चेतसा ।
अथेशकोणमासाद्य ब्राह्मणैरपरैः सह ॥ ३०५ ॥
प्राङ्निर्दिष्टं न्यसेत् तत्र स्नानोपकरणं तु यत् ।
दशार्धगव्यपूर्वं तु कलशेषु पृथक् पृथक् ॥ ३०६ ॥
तानर्च्यार्ध्यादिना पश्चाद् द्विषट्केनाभिमन्त्र्य च ।
समानीय शिलोपेतान् कलशान् पूर्वसम्भृतान् ॥ ३०७ ॥
कर्मावसान में घृतसहित तिल-तण्डुलों से होम करावे । इसी प्रकार संहार
क्रम से वाय्वादि कोण से ईशानकोण पर्यन्त संस्कार कर ऋग्वेद के चार ब्राह्मणों
को स्थापित करे । वे भी अपने-अपने चिह्नों को धारण किये हुए, अपने पवित्र
शाखाओं से भक्ति युक्त चित्त से विधिवत् हवन करें । इसके बाद ईशानकोण में
जाकर अन्य ब्राह्मणों के साथ पूर्वनिर्दिष्ट समस्त स्नानोपकरण स्थापित करे । फिर
कलशों में पृथक्-पृथक् पञ्चगव्य डाले । अर्घ्यादि से अर्चन करे, द्वादशाक्षर
मन्त्र से उसे अभिमन्त्रित करे । पूर्व में स्थापित शिला सहित उन कलशों को ले
आवे ॥ ३०३-३०७ ॥
कलशलक्षणकथनम्
उत्कृष्टधातुसम्भूतान् नवशैलमयांस्तु वा ।
समान् सुपक्वान् सुघनान् मृण्मयांस्तदभावतः ॥ ३०८ ॥
अब कलशों का लक्षण कहते हैं—वे कलश उत्कृष्ट धातुओं के बने होने
चाहिये अथवा नवीन शिलामय से बने होने चाहिये । उनके अभाव में सभी मिट्टी
के कलश समान सुपरिपक्व एवं परिपुष्ट होने चाहिये ॥ ३०८ ॥
द्वादशाङ्गुलिविस्तीर्णांस्तन्मानेन तु चोन्नतान् ।
द्विगुणान् सति सामर्थ्ये नृपाणां हेमजान् हितान् ॥ ३०९ ॥
उनकी लम्बाई का मान द्वादश अङ्गुल तथा उतने ही मान में ऊँचाई होनी