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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 607

५४८ सात्वतसंहिता
निवर्त्तनेन तद्धन्याद् दहते शुभकृद् यतः ॥ ३५ ॥
यात्रा में अशुभ निमित्त का दर्शन होने पर यात्रा का विराम करे और जप
करे । शान्ति-पाठ एवं स्वस्त्ययन पाठ करे । इस प्रकार करने वाला शुभकृत्
अमङ्गल का दहन कर देता है ॥ ३५ ॥
मन्त्रमभ्यर्च्य यात्रायामभ्यर्थ्याज्ञां विनिन्द्य च ।
नैवेद्यशेषभुग् वामचारस्थः संयतेन्द्रियः ॥ ३६ ॥
यात्रा में मन्त्र की अर्चना करे, भगवान् से आज्ञा माँगे, प्रसन्न रहे, भगवान्
के नैवेद्य शेष का भोजन करे, श्रेष्ठ आचरण करे, इन्द्रियों का संयम रखे ॥ ३६॥
प्राङ्मुखः संस्मरेन्मन्त्रं समुत्थायामृतोदये ।
परिज्ञाय पुरा मूर्त्तिं तन्मूर्त्यन्तरमेव वा ॥ ३७ ॥
अमृत बेला में शय्या से उठकर पूर्वाभिमुख हो मन्त्र का स्मरण करे । मूर्त्ति
का अथवा अन्य मूर्त्ति का पता लगा कर उसी दिशा में यात्रा करे । यदि मूर्त्ति का
पता न लगे तो अन्य जिस किसी दिशा में यात्रा करे । यात्रा में सावधान
(होशियार) सहायकों को तथा शिल्पियों को साथ रखे ॥ ३७ ॥
यायात् तदीयं दिग्भागं तदभावात् तु चान्यदिक् ।
सहायैरप्रमत्तैस्तु शिल्पिभिः सह संवृतः ॥ ३८ ॥
लाजदध्यक्षतैः कुम्भैर्यायात् पुष्पपुरस्सरैः ।
सौमनस्यं महोत्साहस्त्वङ्गस्पन्दश्च दक्षिणः ॥ ३९ ॥
यात्रा में आगे लावा, दही, अक्षत, पूर्ण कुम्भ एवं पुष्प का दर्शन करे । मन
को प्रसन्न रखे और महान् उत्साह से युक्त रहे । यात्रा में दाहिने अङ्ग का फड़कना
शुभावह है ॥ ३८-३९ ॥
शुभा वाणी ध्वनिः शाङ्खस्तन्त्री वाद्यं फलादयः ।
गोगजाश्वाद्विजाः कन्या नवभाण्डं च मृद् दधि ॥ ४० ॥
आर्द्रमांसान्यलङ्कारो मदिराग्नी घृतं पयः ।
सिद्धान्नं शालिबीजादि दर्भाः सद्रुममञ्जरी ॥ ४१ ॥
छत्रवस्त्रध्वजा यानं रोचना कुङ्कुमं मधु ।
दर्पणं चामरश्चैव धातवः शस्त्रवर्जिताः ॥ ४२ ॥
रत्नानि वैबुधं बिम्बं मधुमत्तो ह्यकातरः ।
जीवन्मत्स्या निमित्तं च मनसो यदखेददम् ॥ ४३ ॥
तत्सर्वं दर्शने श्रेष्ठं यत् खेददमशोभनम् ।