सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५४७
बर्तन में तीन सप्ताह तक इस प्रकार स्थापित करे जिससे उसमें हवा न लगे ।
अग्नि, सूर्य तथा चन्द्रमा की किरणें उसे स्पर्श न करें । इस प्रकार की मिट्टी को
अच्छे काष्ठ पर स्थापित कर उसका बिम्ब निर्माण करे ॥ २६-२९ ॥
वस्त्रवच्चैव लोहानां कृत्वा प्रक्षालनं ततः ।
मार्जनं भूतिना भूयस्तथा तन्मन्त्रितेन च ॥ ३० ॥
लोहबिम्बनिर्माणार्थं लोहसंशोधनप्रकारमाह—वस्त्रवदिति । तन्मन्त्रितेन अस्त्रा-
भिमन्त्रितेनेत्यर्थः ॥ ३० ॥
भक्त्या प्रवर्तमानस्तु बिम्बसाधनकर्मणि ।
सर्वत्र चास्त्रमन्त्रस्य कुर्यान्निर्विघ्नशान्तये ॥ ३१ ॥
पूजनं हवनं भूतबलिदानं सदक्षिणम् ।
सम्यग् ग्रहणकाले तु एतत् सामान्यमेव हि ॥ ३२ ॥
बिम्बनिर्माणप्रारम्भकाले सामान्यतस्तत्तन्मूर्तिमन्त्रार्चनादिकं कार्यमित्याह—
भक्त्येति द्वाभ्याम् ॥ ३१-३२ ॥
अब लौह बिम्ब के निर्माण के लिये लौह संशोधन का प्रकार कहते हैं ।
लौह का वस्त्र के समान ही जल से प्रक्षालन करे फिर भस्म मन्त्र से अभिमन्त्रित
भूति से उसका मार्जन करे । बिम्ब साधन के काम में भक्तिपूर्वक लगा हुआ साधक
बिम्ब निर्माण की निर्विघ्न शान्ति के लिये सर्वत्र अस्त्र मन्त्र का जप करे । फिर
पूजन करे, होम करे, बलिदान करे, दक्षिणा देवे, फिर लौह बिम्ब का निर्माण
करे । सम्यग् लौह बिम्ब के निर्माण में यही सामान्य विधि है ॥ ३०-३२ ॥
सच्छैलदारुग्रहणे विशेषस्त्वधुनोच्यते ।
सर्वत्रारम्भकाले तु निमित्तमुपलक्ष्य च ॥ ३३ ॥
विशेषाद् वनयात्रायां तच्छुभेन शुभोदयः ।
अशुभेन निमित्तेन यात्रा विघ्नवती भवेत् ॥ ३४ ॥
विशेषेण शिलादारुसंग्रहणविधानमाह—सच्छैलदारुग्रहण इत्यारभ्य सर्वं
चूर्णमयं तत इत्यन्तम् । एतत्प्रयोगस्तु श्रीसात्वतामृते सुविशदं प्रतिपादितो
द्रष्टव्यः ॥ ३३-९० ॥
अब बिम्ब के लिये शैलदारु ग्रहण के प्रकार में विशेष कहते हैं—सर्वत्र
बिम्ब के आरम्भ काल में निमित्त देखे । विशेष कर वन में जाने के लिये शुभ
निमित्त दर्शन से शुभ का उदय होता है । साकाम अशुभ निमित्त के दर्शन से यात्रा
विघ्नवती होती है ॥ ३३-३४ ॥
विरामेण तु जप्येन शान्तिस्वस्त्ययनादिना ।