सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्विंशः परिच्छेदः ५४९
स्वगृहद्वारदेशाच्च पथि सप्तपदावधि ॥ ४४ ॥
क्रममाणे निमित्तं च फलं यच्छत्यनेन हि ।
निर्गत्य नगराद् ग्रामात् क्रोशार्धं क्रोशमेव वा ॥ ४५ ॥
गृह्णीयाच्छाकुनं चिह्नं नकुलादिमयं त्वतः ।
पूर्णात् सार्धाधिकात् क्रोशाद् हितकृन्मृगदर्शनम् ॥ ४६ ॥
शुभ वाणी, शङ्ख की ध्वनि, वीणा का वादन, फलादि, गाय, गज, घोड़ा,
कन्या, नवीन भाण्ड (मिट्टी का बर्तन), मिट्टी, दही, आर्द्र, मांस, अलङ्कार,
मदिरा, आग, घृत, दूध, सिद्धान्त शाली का बीज, कुशा, वृक्ष पर चढ़ी हुई
लता, छत्र, वस्त्र, ध्वज, यान, हरदी, कुङ्कुम, मधु, दर्पण, चामर, शस्त्र रहित
धातु, रत्न, देवता का बिम्ब आकार, मद्य में मस्त जीवित मछली तथा मन को
प्रसन्न करने वाले समस्त निमित्त ये सभी निमित्त दर्शन मात्र से शुभावह होते हैं ।
जो मन को खिन्न करने वाले निमित्त हैं, वे अशुभ हैं । अपने घर के द्वार देश से
सात पग पर्यन्त चलने पर देखे हुए निमित्त फल प्रदान करते हैं । नगर से अथवा
गाँव से एक कोश अथवा आधा कोश चलने पर नकुलादिभय शकुन चिह्न
शुभावह होते हैं । एक कोस पूरा होने पर अथवा डेढ़ कोश पूरा होने पर मृग
दर्शन हितकारी होता है ॥ ४०-४६ ॥
दिङ्मुखे निर्मले सिद्धिर्व्रजेद् यत्र विशेषतः ।
सिद्धिकृच्चाम्बरं स्वच्छं सुदीप्ता भास्करादयः ॥ ४७ ॥
मरुत् सुखावहः स्निग्धः प्रदक्षिणगतिः स्थिरः ।
दिव्याद्युत्पातनिर्मुक्तः स कालः सिद्धिसूचकः ॥ ४८ ॥
जिस दिशा में जाना हो वह दिशा यदि सर्वथा निर्मल हो तो सिद्धि प्राप्त
होती है । स्वच्छ आकाश सिद्धिकारक होता है और सुन्दर प्रकाश युक्त सूर्यादि
सुखावह है । शीतल, मन्द, सुगन्ध से युक्त एवं दाहिनी ओर से बहने वाली वायु
भी सुखावह होती है । इसी प्रकार दिव्य उत्पात रहित काल भी सिद्धि का सूचक
कहा गया है ॥ ४७-४८ ॥
हंसः शुको भरद्वाजः कोकिलः खञ्जरीटकः ।
मयूरो भ्रमरश्चक्रवाकाद्याः खेचराः शुभाः ॥ ४९ ॥
हंस, शुक, भरद्वाज, कोकिल, खञ्जन, मोर, भ्रमर, चक्रवाकादि पक्षी यात्रा
में शुभावह हैं ॥ ४९ ॥
भूचरा नकुलाः सौम्याः सिताहिर्गृहगोधिका ।
गन्धाखुर्जम्बुकश्चैव सर्वेषां दर्शनं शुभम् ॥ ५० ॥