सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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अब चित्र के लिये मिट्टी, काष्ठ, फलक और पटों के संशोधन का प्रकार
कहते हैं । भित्ति संशोधन का प्रकार कहते हैं—चित्रकर्त्ता भीत के पहले का
चार अङ्गुल स्थान छोड़ देवे । तदनन्तर उक्त दोषों की निवृत्ति के लिये बिम्ब के
प्रमाण से कुछ अधिक स्थान जल से प्रक्षालित कर पञ्चगव्य से उसे शुद्ध करे ।
फिर भीत के खाली अंश को सानी हुई मिट्टी से पूर्ण करे । यदि काष्ठफलक पर
चित्र बनाना हो तो शस्त्र से छील कर मृगचर्म के समान उसे कोमल बनावे । यदि
पट पर चित्र बनाना हो तो उसे तुरी पर से उतार देवे । उसके रङ्ग को सात बार
अस्त्र मन्त्र का जप कर जल से धोकर शुद्ध करे ॥ २१-२३ ॥
मृत्संग्रहणादि प्रकारकथनम्
हृन्मन्त्रेण तु सास्त्रेण मूर्तिमन्त्राश्रितेन च ।
तीर्थोद्देशान्नदीतीरात् पुण्यक्षेत्राच्च पर्वतात् ॥ २४ ॥
अपास्य दोषसङ्कीर्णामूर्ध्वदादादाय मृत्तिकाम् ।
साऽवचूर्ण्याऽथ संशोष्य सूपलिप्ते धरातले ॥ २५ ॥
अथ मृद्विम्बनिर्माणार्थं मृत्संग्रहणादिप्रकारानाह—हृन्मन्त्रेणेत्यारभ्य शुभकाष्ठा-
न्तरीकृतमित्यन्तम् ॥ २४-२९ ॥
अब चित्र निर्माण के लिय मृत्तिका संशोधन का प्रकार कहते हैं—चित्र के
लिये अस्त्र मन्त्र सहित हृदय मन्त्र से, अथवा मूर्ति मन्त्र से, तीर्थ स्थान से, नदी
तट से, पुण्य क्षेत्र से, पर्वत से, ऊपर की दोष संकीर्ण मिट्टी हटाकर उसके बाद
की मिट्टी ग्रहण करे । फिर उसे उपलिप्त धरातल पर स्थापित कर शुष्क बनावे
फिर चूर-चूर करे ॥ २४-२५ ॥
शाणमौर्णं च कार्पासं सूत्रं चालसिजं तथा ।
कृत्वा पाषाणभिन्नं प्राग् योज्यं तत्र सवालुकम् ॥ २६ ॥
ईषद्गोमययुक्तेन भूरिक्षीरघृतादिना ।
भावयेत् पञ्चगव्येन खादिरेण कषेण च ॥ २७ ॥
सिद्धार्थकालसिस्नेहतिलोत्थेन च वै सह ।
क्लेदयेच्च त्रिसप्ताहं भाण्डे कृत्वाऽऽयसादिके ॥ २८ ॥
मारुतानलसूर्येन्दुदर्शनिन विनैव हि ।
तया समाप्यं तद्विम्बं शुभकाष्ठान्तरीकृतम् ॥ २९ ॥
सन का, अन का, कपास का, तथा तीसी का सूत लेकर पत्थर से चूर
करे, उसमें बालू मिलावे, फिर थोड़ा गोबर से तथा पर्याप्त दूध और घृत मिलावे ।
पञ्चगव्य से पवित्र करे तथा खैर डाल कर उसे कषाय वर्ण का बनावे । फिर पीली
सरसों, तीसी और तिल का तेल मिलाकर उसे आर्द्र बनावे । तदनन्तर लोहादि के