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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 567

५०८ सात्वतसंहिता
सह घण्टारवेणैव दीपार्थं परिवर्जयेत् ।
मेदो मज्जाऽतसीतैलं घृतं तैलविमिश्रितम् ॥ ३६ ॥
दीप के लिये मेद, मज्जा, अतसी का तेल तथा तैल विमिश्रित द्रव्य का
प्रयोग वर्जित है ॥ ३६ ॥
नाविकं मधुपर्कार्थे दधिक्षीरादिकं शुभम् ।
कौलत्थः कौद्रवः कृष्णशाल्युत्थो नौदनो हितः ॥ ३७ ॥
नापक्वान्नं न मांसञ्च नारनालविभावितम् ।
मधुपर्क के लिये भेंड का दधि एवं क्षीर शुभावह नहीं है । इसी प्रकार नैवेद्य
के लिये कुलत्थ, कोदो एवं कृष्णशाली का भात शुभावह नहीं है । इसी प्रकार
नैवेद्य में अपक्वान्न, मांस तथा आरनाल (काँजी) मिश्रित अन्न वर्जित है । पूजा
करते समय जल्दीबाजी से न उठे ॥ ३७-३८ ॥
न चाराधनकाले तु समुत्तिष्ठेत् त्वरान्वितः ॥ ३८ ॥
आ समाप्तिक्रियां चैव उपरोधेन केनचित् ।
आराधनकाले केनचित् कारणेन त्वरया नोत्थातव्यमित्याह—नेति ॥ ३८-३९॥
किसी उपरोध से अपने को बन्द कर विष्णु पूजा करे और जब तक वह
समाप्त न हो जावे तब तक न उठे ॥ ३८-३९ ॥
आधाराद् भगवद्विम्बाद् भद्रपीठान्मलच्युतिः ॥ ३९ ॥
न कार्या कण्टकैर्लोहैर्मृदुकूर्चादिना विना ।
न स्नायान्न स्वपेन्नग्नो न मौनं चाचरेद् गुरोः ॥ ४० ॥
बिम्बादिशोधनं शिखिपक्षादिमृदुकूर्चेर्विना कण्टकादिभिर्न कार्यमित्याह—
आधारादिति ॥ ३९-४० ॥
भगवदाधार भगवद् चित्त भद्रपीठ से मलिनता-निवारण कोमल कूर्च के
अतिरिक्त काँटे अथवा लौह जैसे कड़े पदार्थों से न करे । निर्वस्त्र हो कर स्नान
तथा शयन न करे । गुरु को चुप न करे ॥ ३९-४० ॥
नोच्छिष्टं संस्पृशेत् किञ्चिन्नाश्नीयाद् भगवद्गृहे ।
सन्निकर्षे न चाग्नेस्तु न गृहे मद्यसंकरे ॥ ४१ ॥
स्नानकाले स्वापकाले च विवस्त्रो न भवेत्, गुरुषु मौनं न कुर्यात्, उच्छिष्टं न
स्पृशेत्, भगवन्मन्दिरादिषु न भुञ्जीतेति चाह—नेति सार्धेन । अत्र भोजननिषेधमात्र-
तात्पर्येण निकृष्टोत्कृष्टानां सह पाठः कृत इति बोध्यम् । यथा "श्वयुवमघोनाम्"
(६।४।१३३) इति सहपठिताः पाणिनिना ॥ ४१ ॥