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सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 566, कुल 837 में से

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पृष्ठ 566

एकविंशः परिच्छेदः ५०७
वज्रपात से आहत, कृमि, कीट संयुक्त सभी पत्र, पुष्प, फलादि प्रयत्नपूर्वक वर्जित
करे ॥ २४-२८ ॥
योक्तव्यानि पवित्राणि नित्यमाराधने तु वै ।
साङ्कुराणि च पत्राणि भूगतान्येवमेव हि ॥ २९ ॥
विहितान्यर्चने नित्यं यथर्तुप्रभवाणि च ।
न गृहे करवीरोत्थैः कुसुमैरर्चनं हितम् ॥ ३० ॥
सित रक्त एवं नील वर्णों वाले सुगन्धित पवित्र कमल नित्य आराधन में
अवश्य ग्राह्य हैं, इसी प्रकार अङ्कुरयुक्त पृथ्वी से संयुक्त पत्र जो ऋतुकाल के
अनुसार उत्पन्न होते हैं । वे भी अर्चन में विहित है, अतः ग्राह्य है, घर पर कनैल
(करवीर) के पुष्पों से अर्चन न करे ॥ २९-३० ॥
विशेषतः सकामस्य सिद्धिभूतयुतस्य च ।
अतोऽन्यथा न दोषोऽस्ति दोष उन्मत्तकादिभिः ॥ ३१ ॥
सद्योहृतानां विहितस्त्वम्लानानां यथा क्रयः ।
प्रदानमम्बुसिक्तानां तेषां कार्यं न चान्यथा ॥ ३२ ॥
विशेष कर सकाम अर्चन करने वालों तथा सिद्धि से युक्त लोगों के लिये
यह निषेध है । इससे अतिरिक्त लोगों के लिये करवीरार्चन निषिद्ध नही है ।
धतूरादि द्वारा अर्चन अवश्य निषिद्ध है । तुरन्त चुने गये म्लानता रहित
(विकसित) पुष्पों को खरीद कर भी पूजा का विधान हैं, किन्तु खरीदने के बाद
उन्हें जल से संसिक्त कर ही पूजा करे, अन्यथा नहीं ॥ ३१-३२ ॥
निर्दोषतां प्रयान्त्याशु मन्त्रिणामवलोकनात् ।
भवन्ति भक्तिपूतानि हृन्मन्त्रनिरतात्मनाम् ॥ ३३ ॥
हृदय मन्त्र में निरत मन्त्रज्ञ पुरुषों के अवलोकन से भी पुष्प निर्दोष हो जाते
हैं । किं बहुना, भक्ति से भी वे पूत हो जाते हैं ॥ ३३ ॥
न कांस्यपात्रे भोक्तव्यं न तत्र विनिवेदयेत् ।
देवाय मधुपर्काद्यं तथा वै सति सम्भवे ॥ ३४ ॥
मृण्मयायसपात्रेषु न धूपमपि निर्दहेत् ।
धूपार्थं गुग्गुलुः साज्यो देयश्चाभवतोऽपरः ॥ ३५ ॥
कांस्य पात्र में भोजन न करे । उसमें भोजन रख कर नैवेद्य अर्पित नं करे ।
इसी प्रकार संभव होने पर देवताओं के लिये कांस्य पात्र में अर्घ्य प्रदान भी न
करे । मिट्टी के पात्र तथा लोहे के पात्र धूप भी न जलावे अभाव में धूप के लिये
साज्य गुग्गुल घण्टा शब्द के साथ दिया जा सकता है ॥ ३४-३५ ॥