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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 562

एकविंशः परिच्छेदः ५०३
क्रमणीयं न पादेन कल्प्यं नैवासनार्थतः ।
भगवच्छासनज्ञानामाराधनरतात्मनाम् ॥ १० ॥
यथोचितं यथाशक्ति पूजा कार्या सदैव हि ।
शङ्खचक्राद्यङ्कितपात्रे न भोक्तव्यमित्याह—नेत्यर्द्धेन शङ्खचक्राङ्कितं शिलाकाष्ठ-
लोष्टफलकादिकं च पादेन नाक्रमणीयम्, आसनार्थं न कल्पनीयमिति चाह—
तल्लक्ष्मेति । भगवच्छास्त्राभिज्ञानां तदुक्तभगवदाराधननिष्ठानां च निरन्तरं यथा-
शक्त्यर्चनं कार्यमित्याह—भगवच्छासनेति ॥ ९-११ ॥
जिस पात्र में शङ्ख एवं चक्र का चिह्न अङ्कित हो, उस पात्र में भोजन न
करे । जिस उपल, काष्ठ, लौह तथा फलकादिक में शङ्ख एवं चक्र का चिह्न हो
उसे पैर से लङ्घन न करे तथा उनका आसन न बनाये । भगवत् शास्त्रों के विज्ञाता
तथा भगवच्छास्त्रोक्त विधि से आराधना करने वाले भक्तों का यथाशक्ति सर्वदा
अर्चन करना चाहिए ॥ ९-११ ॥
प्रासादं देवदेवीयमाचार्यं पाञ्चरात्रिकम् ॥ ११ ॥
अश्वत्थं च वटं धेनुं सत्समूहं गुरोर्गृहम् ।
दूरात् प्रदक्षिणीकुर्यान्निकटात् प्रतिमां विभोः ॥ १२ ॥
दण्डवत्प्रणिपातैस्तु नमस्कुर्याच्चतुर्दिशम् ।
भगवद्विमानादीनां प्रदक्षिणनमस्कारप्रकारावाह—प्रासादमिति द्वाभ्याम् ।
छायाक्रमणभिया दूरादित्युक्तमिति ज्ञेयम् ॥ ११-१३ ॥
देवता, देवों का प्रासाद, आचार्य, पाञ्चरात्रिक, अश्वत्थ, वट; धेनु, सत्समूह
एवं गुरु का घर दूर से ही देखकर इनकी प्रदक्षिणा करे, सन्निकट से प्रदक्षिणा
करने में छायोल्लङ्घन का भय है ॥ ११-१३ ॥
न यानपादुकारूढो न सोपानत्कपादभृत् ॥ १३ ॥
न विक्षिप्तमना भूत्वा संविशेद् भगवद्गृहम् ।
न व्याख्यावसरे कुर्यात् प्रत्युत्थानाभिवादने ॥ १४ ॥
भगवन्मन्दिरप्रवेशकाले पादुकामुपानहं वा पद्भ्यां न स्पृशेदन्तर मनोवृत्तिं च न
वर्तयेदित्याह—नेति ॥ १३-१४ ॥
भगवन्मन्दिर में सवारी से, पादुका धारण कर, जूता पहन कर तथा विक्षिप्त
मन से प्रवेश न करे । गुरु यदि शास्त्र की व्याख्या करते हों, तो उस समय
प्रत्युत्थान अभिवादन न करे ॥ १३-१४ ॥
नाभक्तानां न मूर्खाणां नास्तिकानां विशेषतः ।
दातव्यः सम्प्रवेशश्च नोपहासरतात्मनाम् ॥ १५ ॥