सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 554, कुल 837 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 554

विंशः परिच्छेदः ४९५
स तत्रस्थेन मन्त्रेण सम्यक् सिद्धिव्यपेक्षया ।
सहस्रावर्तितं कृत्वा शतावर्तितमेव वा ॥ १० ॥
तदनन्तर देवाधिदेव के सामने अर्घ्य पुष्पादि से पद्मासन पर बैठे हुए शिष्य
की पूजा कर हाथ जोड़े हुए शिष्य को उस मण्डप में आरोपित करे । उस समय
सौभाग्यवती सुन्दर स्त्रियाँ गान करें, बन्दी लोग स्तुति करें, अन्य लोग शङ्ख
बजावें, मङ्गल पाठ करें, कोई पर-मन्त्र का जप करे और कोई अच्युत का ध्यान
करे । तदनन्तर वैष्णव कुम्भ के द्वारा अष्टाङ्ग से उसकी अर्चना करनी चाहिये ।
तदनन्तर वह आचार्य शिष्य सिद्धि की अपेक्षा रखते हुए तत्रस्थ मन्त्र का एक
सहस्र संख्या में अथवा शत संख्या में जप करे ॥ ७-१० ॥
सिद्धये द्रुतहेमाभं स्मृत्वा तमभिषिच्य च ।
स्वाहान्तमन्त्रमुच्चार्य प्लुतं हृत्कमलोदरात् ॥ ११ ॥
एवमुक्त्वा नमोऽन्तं तु ध्यात्वा तं स्फटिकामलम् ।
समुत्कीर्य खरन्ध्रेण तस्य हृत्पद्मगं स्मरेत् ॥ १२ ॥
सिद्धि के लिये तपाये हुए काञ्चन वर्ण के समान मन्त्र का स्मरण करना
चाहिए । तदनन्तर साधक हृत्कमलोदर से निकले हुए स्वाहान्त मन्त्र का उच्चारण
कर अभिषेक करे । फिर स्फटिक के समान अमल मोक्ष का नमोऽन्त उच्चारण
कर, उसे आकाश मण्डल से, शिष्य के हृदय रूपी पद्म में स्थापित कर,
स्मरण करे ॥ ११-१२ ॥
चिच्छक्तिविग्रहं ब्रह्म त्वात्मानन्दलक्षणम् ।
समारोप्य धिया सम्यक् स्वाधिकारं तु चाखिलम् ॥ १३ ॥
प्रतिपाद्यार्चितं शुद्धं दिव्यमागमसञ्चयम् ।
शुभमाराधनाधारमक्षसूत्रं च किङ्किणीम् ॥ १४ ॥
स्रुक्स्रुवौ योगपट्टं च शङ्खचक्रे कमण्डलुम् ।
चमसं सार्घ्यपात्रं च दर्भान् कृष्णाजिनं ततम् ॥ १५ ॥
पादुके पादपीठं च च्छत्रमासनदर्पणम् ।
मायूरं व्यजनं शुक्लं चामरं भगवद्ध्वजम् ॥ १६ ॥
यथार्हदण्डसहितं काषाये क्षौमवाससी ।
समुत्थाप्यासनात् सर्वमाहृत्य स्नानजं जलम् ॥ १७ ॥
विनिक्षिप्य शुचौ स्थाने देवमभ्यर्च्य वै ततः ।
तादर्थ्येन तु सन्तर्प्य पूर्णान्तं चाग्निमध्यगम् ॥ १८ ॥