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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 478

अष्टादशः परिच्छेदः ४१९
एवं पृष्ठो वासुदेवः प्रथमं क्षमापरिग्रहपूर्वकं दीक्षामण्डपनिर्माणप्रकारमाह—
'शुभेऽनुकूले नक्षत्र' इत्यारभ्य 'बलिं सर्वत्र सर्वदा' इत्यन्तम् ॥ ४-२५ ॥
श्री भगवान् के कहा—शुभ अनुकूल नक्षत्र, तिथि, शुभ ग्रह से दृष्ट लग्न
में भक्तों के निवास के लिये साधक सर्वप्रथम भूमि अधिग्रहण करे । वह भूमि
उत्तम मिट्टी, जल, फल तथा पुष्प से समृद्ध हो । समिद् कुशा समन्वित हो,
अनुकूल पुण्य प्रदेश में हो, मनोज्ञ हो और साधु सन्तों से सेवित हो ॥ ४-५ ॥
गोसस्यशालिसुभगे क्षुद्राप्राणिविवर्जिते ।
तत्र वर्णानुरूपाम् क्ष्माम् गच्छेत् पूर्वोक्तलक्षणाम् ॥ ६ ॥
सर्वदोषविनिर्मुक्तां सत्पक्षमृगसेविताम् ।
या शुभायतननोद्देशैर्मठैर्गोष्ठापणैर्गृहैः ॥ ७ ॥
तोयाशायाश्रमैः क्षेत्रैः सद्धैरन्तरीकृता ।
जलौघभयनिर्मुक्ता बलाद् भुक्त च सज्जनैः ॥ ८ ॥
वनैरुपवनैर्ग्रामैर्नगराङ्गैः समावृता ।
अलाभे सति लाभे वा स्वभूमेर्ब्राह्मणादिषु ॥ ९ ॥
स्वमन्त्रेणार्चनात् स्वत्वं कुर्याद् वर्णव्यपेक्षया ।
उद्धृतां कृतखातां च ज्ञात्वा दोषोज्झितां पुरा ॥ १० ॥
गाय एवं हरे भरे सस्यों से पूर्ण हो और वहाँ क्षुद्र प्राणि न हों । इस प्रकार
अपने वर्ण के अनुरूप पूर्वोक्त लक्षण वाली भूमि का अधिग्रहण करे । वह भूमि
समस्त दोषों से रहित तथा उत्तम पक्षियों के एवं उत्तम मृगों से सेवित होनी
चाहिये । जो शुभायतन, शुभ उद्देश्य वाली, शुभ मठों, शुद्ध आपणों (बाजारों)
तथा शुभ ग्रहों से समन्वित हो । वहाँ जलाशय, आश्रम क्षेत्र तथा सदाचारी
सज्जनों का निवास हो । जल प्लावन की संभावना न हो तथा सज्जन लोग
हठपूर्वक रहने के लिये विवश हों । वह भूमि वन, उपवन, ग्राम, नगर के अङ्गों
से समावृत (घिरा) हो । यदि ऐसी भूमि न प्राप्त हो, तब ब्राह्मणादि से खरीद कर
प्राप्त करे, अथवा अपने मन्त्र से भूमि का अर्चन कर अपने वर्णानुसार भूमि पर
अधिकार करे ॥ ६-१० ॥
शुभमृत्पूरितां कृत्वा लध्वश्मभिरथान्तरा ।
ततस्त्वाकुट्टयेत् पश्चात् पञ्चगव्येन सेचयेत् ॥ ११ ॥
युक्तां हेमादिसद्रत्नैः समीकृत्योपलिप्य च ।
तत्रार्चनं विभोः कुर्याद् ध्यानान्तं चैव पूर्ववत् ॥ १२ ॥
वहाँ के ऊपर की मिट्टी अथवा खन कर भीतर की मिट्टी की परीक्षा करे ।
जब वह सर्वथा दोषरहित हो । तब वहाँ के गड्ढे आदि को शुभ मृत्तिका से पूर्ण