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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 477

अष्टादशः परिच्छेदः
अधिवासदीक्षाविधिः
नारद उवाच
एवमुक्ते सति पुनः कामपालो मुनीश्वराः ।
उवाचेदं हरिं वाक्यं लोकानुग्रहकाम्यया ॥ १ ॥
अथाष्टादशः परिच्छेदो व्याख्यास्यते। संकर्षण पृच्छतीत्याह—एवमिति ॥ १ ॥
नारद जी ने कहा—हे मुनिश्वरों ! भगवान् वासुदेव द्वारा इस प्रकार कहे जाने
पर सङ्कर्षण ने संसार पर अनुग्रह करने की कामना से पुनः श्रीकृष्ण से कहा ॥१॥
सङ्कर्षण उवाच
सम्प्राप्तप्रत्ययानां च द्विजातीनां च साम्प्रतम् ।
सम्यक् प्रक्षीणपापानामारूढानामिह क्रमे ॥ २ ॥
दीक्षात्रयस्य भगवन् ज्ञातुमिच्छामि निर्णयम् ।
यत्प्राप्य भगवद्भक्तः कृतकृत्योऽचिराद्भवेत् ॥ ३ ॥
प्रश्नप्रकारमाह—सम्प्राप्तेति द्वाभ्याम् ॥ २-३ ॥
सङ्कर्षण ने कहा—हे प्रत्यय! जिन द्विजातियों को आप में प्रत्यय (आस्था,
विश्वास) प्राप्त हो गया है । जिनके पाप सर्वथा प्रक्षीण हो चुके हैं और जो वैष्णव
दीक्षा-क्रम में आरुढ़ हो गये हैं । उन द्विजातियों के तीनों दीक्षा क्रमों को मै जानना
चाहता हूँ, जिसे प्राप्त कर भगवद् भक्त अपने को कृतकृत्य बना लेता है ॥२-३॥
दीक्षामण्डपनिर्माणप्रकारकथनम्
श्रीभगवानुवाच
शुभेऽनुकूले नक्षत्रे तिथौ लग्ने ग्रहेक्षिते ।
भक्तानामधिवासार्थं क्ष्मापरिग्रहमाचरेत् ॥ ४ ॥
पुण्ये देशेऽनुकूले च मनोज्ञे साधुसेविते ।
मृद्वारिफलपुष्पाढ्ये समित्कुशसमन्विते ॥ ५ ॥