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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 432

सप्तदशः परिच्छेदः ३७३
तथैव रात्रिशेषं तु कालं सूर्योदयावधि ।
कर्तव्यं सजपं ध्यानं नित्यमाराधकेन तु ॥ १४८ ॥
अथ भोजनानन्तरमा सायं सद्ध्यानमन्त्रजपं सायंकाले जलमध्ये स्वमन्त्रार्चनतर्पणं
तदारभ्य सूर्योदयावधि च सध्यानजपमाह—भोजनान्त इति द्वाभ्याम् ॥ १४७-१४८ ॥
भोजन के अनन्तर सायङ्काल के समय जल से तर्पण कर मन्त्रजाप करे ।
फिर ध्यान करे । आराधक को रात्रिकाल के शेष काल से सूर्योदय पर्यन्त निरन्तर
जप और ध्यान में व्यतीत करना चाहिये ॥ १४७-१४८ ॥
एवमेव विधानेन पूजयित्वा दिने दिने ।
जपेलक्षाष्टकं मन्त्री ततः सिद्ध्यति मन्त्रराट् ॥ १४९ ॥
ददाति मनसोऽभीष्टा सिद्धिः सर्वानुरूपकाः ।
रुद्रादित्येन्द्रऋषिभ्यो भक्तेभ्यश्च मयोदितम् ॥ १५० ॥
एवं प्रत्यहं भगवदर्चनपूर्वकं शिष्यैर्लक्षाष्टसंख्याके जपे कृते मन्त्रसिद्धिर्भवति,
ततः स्वेष्टसिद्धिश्च भवतीत्याह—एवमेवेति सार्धेन ॥ १४९-१५० ॥
इस प्रकार दिन-प्रतिदिन पूजा कर मन्त्रज्ञ साधक आठ लाख की संख्या में
जप करे । तब मन्त्रराज सिद्ध हो जाते हैं । सिद्ध हो जाने पर ये मन्त्रराज
सर्वानुरूप मानसिक सिद्धियाँ प्रदान करते हैं ॥ १४९-१५० ॥
इसके अतिरिक्त जो बात यहाँ नहीं कही गई है उसे रुद्रादित्यादि के लिये
एवं ऋषियों के लिये और भक्तों के लिये अन्यत्र कहा गया है । उसे वहाँ से ज्ञात
कर कर्म करना चाहिए ॥ १५० ॥
लोकचित्तानुसारेण शास्त्रं वै युगभेदतः ।
यागो यागोपकरणं विमलं प्रतिपादकम् ॥ १५१ ॥
ज्ञातव्यं तत् त्वया सम्यगविरोधेन सर्वदा ।
आगमेभ्योऽथ तज्ज्ञेभ्यः सकाशादात्मसिद्धये ॥ १५२ ॥
अनुक्तमन्यतो ग्राह्यमित्याह—रुद्रादित्येत्यादिभिः । अविरोधेन स्वोक्तार्था-
विरोधेनेत्यर्थः ॥ १५०-१५२ ॥
उन स्थानों पर युगभेद से लोकचित्तानुसार वहाँ याग एवं यागोपकरण का
स्पष्ट रूप से प्रतिपादन किया गया है ॥ १५१ ॥
हे सङ्कर्षण ! वे सभी बातें अपनी कही हुई बातों के अनुसार ही यहाँ कही
गई हैं—किसी बात में कहीं कोई विरोध नहीं है, ऐसा समझना चाहिये । यहाँ
आत्मसिद्धि के लिये आगमशास्त्र के अनुसार जो नृसिंहानुष्ठान के पूर्ण ज्ञाता हैं
उनसे जान कर सभी बातें कही गई हैं ॥ १५२ ॥