सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः परिच्छेदः ३६९
अथ शिष्याणां समयोपदेशप्रकारमाह-समयान् श्रावयेत् पश्चादित्यारभ्य
प्राप्नुयान्मन्त्रजं फलमित्यन्तम् । कुम्भमण्डलादिस्थितभगवद्विषयकया यया भक्त्या
ऐहिकामुष्मिकफलसिद्धिर्भवति, तां भक्तिं करणत्रयेणापि न त्यजेदिति प्रथम-
नियमार्थः । साध्यं विना औषधिसवनादिकं विनेत्यर्थः । तल्पादिकं = व्याघ्रचर्म-
कृततल्पादिकमित्यर्थः । न स्पृशेदित्यत्रापि पादेनेत्यनुषङ्गः । परिपीडं = शुद्धोपोषण-
मित्यर्थः । आ नाभिवर्धनात् कालाद् अन्यत्र नाभिनालच्छेदनानन्तरमित्यर्थः । तत्पूर्वं
सूतकाभावादिति भावः । तथा च जैमिनिः-
यावन्न छिद्यते नालं तावन्नाप्नोति सूतकम् ।
छिन्ने नाले ततः पश्चात् सूतकं तु विधीयते ॥ इति ।
एवं च-
अत्र दद्यात् सुवर्णं वा भूमिं गां तुरगं रथम् ।
छत्रं छागं वस्त्रमाल्ये शयनं वासनं गृहम् ॥
धान्यं गुडं तिलं सर्पिरन्यद्वास्ति गृहे वसु ।
आयान्ति पितरो देवा जाते पुत्रे गृहं प्रति ॥
तस्मात् पुण्यमहः प्रोक्तं भारते चादिपर्वणि ।
इत्युक्तप्रकारेणापि स्पष्टमेव श्रीनृसिंहो भजनीय इति फलितोऽर्थः ।
मन्त्रमण्डलमूद्राणां गोपनं पूर्वमुक्तम् । स्वानुष्ठानमित्यनेन शास्त्रस्य गोपनमुक्तमिति
ज्ञेयम् ॥ १२४-१४० ॥
फिर गुरु उन शिष्यों को वैष्णव-धर्म के नियमों को इस प्रकार सुनावे-जिन
कुम्भ अग्नि मण्डल पर स्थित भगवान् की भक्ति से आपने ऐहिक एवं आमुष्मिक
समस्त कल्याणों की प्राप्ति की है । उन भगवान् की भक्ति का मन, वचन और
कर्म से कदापि परित्याग न करना-यह प्रथम नियम है । साध्य (कारण) के बिना
स्नानादि क्रिया का लोप नहीं करना-यह दूसरा नियम है । जीवन पर्यन्त
यथाशक्ति जहाँ कहीं भी संस्थित रहे वहीं हृदयादि स्थानों में मन्त्रगणों का अर्चन
करते रहना चाहिये ॥ १२४-१२६ ॥
यदि पुष्प, जलादि पूजा सामग्री हो तो उन्ही द्रव्यों से पूजन करे और उसके
अभाव में हृदय में ही मानसी पूजा न्यास विधानपूर्वक करे ॥ १२७ ॥
मन्त्रनाथ, गुरु और मन्त्र में समान दृष्टि रखे । मन्त्र, मण्डल और मुद्रा को
सर्वथा गुप्त रखे ॥ १२८ ॥
मृगराट् तथा व्याघ्र को देखकर उन्हें दूर से ही नमस्कार करे । उसकी
आकृती के समान अन्य मृगादिकों को भी देखकर नमस्कार करे । उसके चर्म पर
कदापि ने बैठे, न आरोहण करे ॥ १२९ ॥
पैर से स्पर्श भी न करे, व्याघ्र चर्मादि द्वारा निर्मित शय्या का पैर से स्पर्श
न करे । कमल पत्र तथा अश्वत्थपत्र का पात्र न बनावे और न उस पर कदापि
भोजन ही करे ॥ १३० ॥