सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
पृष्ठ 426, कुल 837 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशः परिच्छेदः ३६७
स्वरूपापादनार्थं तु मूलबीजेन वै तथा ॥ १२१ ॥
प्रणवादिनमोऽन्तेन कुर्याद् होममतन्द्रितः ।
ध्यात्वा निरस्तबन्धं तं शुद्धं शान्तं तु सर्वगम् ॥ १२२ ॥
समस्तसंवित्पूर्णं च दद्यात् पूर्णाहुतिं ततः ।
मूलमन्त्रेण मन्त्रज्ञो भक्तानामनुकम्पया ॥ १२३ ॥
अस्मिन्नवसरे कर्तव्यं शिष्याणां नृसिंहमन्त्रदीक्षाक्रममाह—ततः शुचीनित्यारभ्य
भक्तानामनुकम्पयेत्यन्तम् । शोधितान् पूर्वोक्तब्रह्मकूर्चप्रायश्चित्तादिभिः संशुद्धानित्यर्थः ।
प्रक्षेपयेत् तदञ्जलिस्यपुष्पाणीति शेषः । देवः = मण्डलस्थो देव इत्यर्थः । तत्कालम्
भक्तिभावेन = वक्ष्यमाणोत्पुलकानन्दबाष्पादिभक्तिसूचकेनेत्यर्थः । व्यक्तसंशुद्धौ =
महदादिरूपेण स्थूलावस्थापन्नप्रकृतिशुद्ध्यमित्यर्थः । द्वादशार्णेन नृसिंहद्वादशाक्षरेणे-
त्यर्थः । अङ्गसमूहेन हृन्मन्त्रादिषट्केन । अव्यक्तशुद्ध्यर्थं = सूक्ष्मावस्थापन्नप्रकृति-
शुद्ध्यर्थमित्यर्थः । स्वरूपापादनार्थं = चेतनशुद्ध्यर्थमित्यर्थः । मूलमन्त्रेण = नृसिंह-
बीजेनेत्यर्थः ॥ ११५-१२३ ॥
इसके बाद पवित्रता से पूर्ण कार्य, वचन, मन से सर्वथा शुद्ध जिनके नेत्र
बँधे हुए हों ऐसे हाथ में पुष्प लिये हुए भक्तों का प्रवेश करावे । फिर उनका नेत्र
खोल कर मन्त्र कुसुमाञ्जलि का उन्हीं से प्रक्षेप करावे ॥ ११५-११६ ॥
वे भक्त भगवान् को प्रदक्षिणा सहित अष्टाङ्ग प्रणाम करें, तदनन्तर देव,
अग्नि, गुरु और कलश की पुनः पूजा करें ॥ ११७ ॥
इस प्रकार तत्काल भक्तिभाव देखकर जब गुरु उसकी योग्यता का ज्ञान कर
लेवे, तब उत्तम और मन्द के क्रम से उन शिष्यों को दीक्षा प्रदान करे ॥ ११८ ॥
फिर स्थूलावस्थापन्न प्रकृति की शुद्धि के लिये द्वादशवर्ण के मन्त्र से एक
सौ आठ बार तिल और घृत से बुद्धिमान गुरु होम करे ॥ ११९ ॥
फिर अर्घ्यादि द्वारा मन्त्र देवता को पूर्णाहुति प्रदान करे । पुनः इसके बाद
हृन्मन्त्रादि छह मन्त्रों से अङ्गसमूहों को आहुति प्रदान करे ॥ १२० ॥
फिर सूक्ष्मावस्थापन्न प्रकृति की शुद्धि के लिये तथा स्वरूप की प्राप्ति के
लिये नृसिंह बीज से पुनः होम करे ॥ १२१ ॥
उक्त पूर्णाहुति होम भगवान् को सर्वथा बन्धनरहित, शुद्ध, शान्त, सर्वग एवं
समस्त संविदापूर्ण समझकर उनका ध्यान भक्तों के ऊपर प्रसन्न होने के लिये करना
चाहिए ॥ १२२-१२३ ॥
शिष्याणां समयोपदेशप्रकारविधानम्
समयान् श्रावयेत् पश्चात् कुम्भेऽग्नौ मण्डले ततः ।
भक्त्या यया तु सम्प्राप्तमैहिकामुष्मिकं त्वया ॥ १२४ ॥