सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा
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ज्ञातव्याऽऽराधकेनैव नित्यं कर्मणि कर्मणि ॥ ४१ ॥
सर्वमन्त्राराधनेष्वप्ययमेवावाहनादिक्रमो ज्ञेय इत्याह—
क्रम इति सार्धेन ॥ ४०-४१ ॥
आराधक को इसी प्रकार इन देवताओं के भूषणादि लाञ्छनपूर्वक क्रियाओं
का ध्यान एवं इनकी आवाहनादि क्रम की कल्पना नित्य प्रत्येक कर्म में जानना
चाहिये ॥ ४१ ॥
मन्त्रन्यासमतः कुर्याद् हस्तन्यासं विना विभोः ।
ध्यात्वाऽथ भावनाजातैर्भोगैः परमपावनैः ॥ ४२ ॥
पूजयित्वा जपान्तं चाप्यवतार्य बहिर्यजेत् ।
अथ स्वहृदये भगवतोऽङ्गन्यासपूर्वकं जपयज्ञान्तं मानसैरुपचारैरभ्यर्च्य बहिर्यागं
च कुर्यादित्याह—मन्त्रन्यासमिति सार्धेन ॥ ४२-४३ ॥
इसके बाद अपने हृदय में भगवान् का अङ्गन्यासपूर्वक जप, यज्ञान्त मानस
उपचारों से पूजन एवं परमपान भोगों से नैवेद्य चढ़ाकर उसके बाद नीचे उतार कर
बहिर्याग करे ॥ ४१-४२ ॥
दक्षिणोत्तरहस्ताभ्यां हृद्बीजेन विचिन्त्य च ॥ ४३ ॥
सूर्यसोमौ ततः कुर्याद् द्रव्यदाहसमुद्भवौ ।
तोयमादाय पात्रेऽथ तत्र हृन्मन्त्रितं क्षिपेत् ॥ ४४ ॥
बहिर्यागविधिं दर्शयन् प्रथममर्घ्यादीनां दहनाप्यायनमुद्रादर्शनमाह—
दक्षिणेति ॥ ४३-४४ ॥
दायें बायें दोनों हाथों से हृद् बीज (नमः) से भगवान् का ध्यान कर प्रथम
अर्घ्य मुद्रा प्रदर्शित करे । फिर दहन एवं आप्यायन मुद्रा प्रदर्शित करे । फिर सूर्य
तथा सोम से द्रव्य का दाह तथा उसकी उत्पत्ति करे । अब पूजन सामग्री का
प्रोक्षण कहते हैं—किसी पात्र में जल ले कर हृदय मन्त्र (नमः) से अभिमन्त्रित कर
उससे सभी सामग्री का प्रोक्षण करना चाहिये ॥ ४३-४४ ॥
पुष्पगन्धसमोपेतं सुसितं शालितण्डुलम् ।
मन्त्रयेत् प्रणवाद्येन बहुशो हृदयेन तु ॥ ४५ ॥
तदुद्धृतेनाम्भसा वा अस्त्रमन्त्रं समुच्चरन् ।
प्रोक्षयेत् स्वासनस्थानं यागोपकरणं तथा ॥ ४६ ॥
पूजोपकरणानां प्रोक्षणमाह—तोयमिति सार्धद्वयाभ्याम् ॥ ४४-४६ ॥
इसके बाद पुष्पगन्ध से वासित सुन्दर एवं श्वेत शाली धान के चावल को
प्रणवादि हृदय मन्त्र (ॐनमः) से अभिमन्त्रित करे ॥ ४५ ॥