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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 381

३२२ सात्वतसंहिता
कालं वैष्णवं वैष्णवमानसंज्ञम्, उत्तमं तं विद्धि । पारमेश्वरव्याख्याने— "एकादश्यादि
चान्तो य इत्यत्र एकादश्यामादिरारम्भस्तत्र तीर्थं वा" इति विलिखितम् । तद्वि-
चारणीयम् ॥ १०-१३ ॥
वह पवित्रारोपण चातुर्मास्य काल में पवित्र शुभ तिथि में करे, आषाढ़ की
पूर्णिमा से लेकर कार्तिक की पूर्णिमा तक का दिन चातुर्मास्य कहा जाता है ॥ १० ॥
जिस दिन चन्द्रमा सायं से कार्तिक मास के जिस दिन सारा दिन चन्द्रमा
हो उस दिन को 'पूर्णमासी' कहा जाता है उतना चान्द्रमान काल 'अधम' कहा
जाता है ॥ १०-११ ॥
कर्क की संक्रान्ति से लेकर तुलाभोगक्षयावधि पर्यन्त इस प्रकार कुल आठ
पक्ष का सौर काल 'मध्यम' संज्ञक कहा जाता है। अतः आषाढ़ शुक्ल एकादशी
से लेकर कार्त्तिक शुक्ल एकादशी के अन्त तक का काल विद्वानों द्वारा चातुर्मास्य
'उत्तम' संज्ञक कहा जाता है ॥ ११-१२ ॥
अप्राप्तेरस्य कालस्य त्वन्तरायेण केनचित् ॥ १३ ॥
निर्वाहणीयोऽप्यपरः कालश्चान्द्रायणादिना ।
उत्तमकालालाभेऽधमादिकाले वेदनुष्ठेयमित्याह—अप्राप्तेरिति ॥ १३-१४ ॥
यही काल वैष्णव मान के अनुसार चातुर्मास्य समझना चाहिये जो सर्वोत्तम
है। यदि इस प्रकार का काल संभव न हो, तब अधमकाल में भी वेदानुष्ठान
(पवित्रारोपण) अनुष्ठेय है ॥ १३-१४ ॥
सम्पाद्यं चैव तन्मध्ये विधिवद् यागपूरकम् ॥ १४ ॥
दिनत्रये तु पूर्वोक्ते पूर्णिमाद्युपलक्षिते ।
सोपवासैः क्रियापूर्वं कर्म प्रातिसरीयकम् ॥ १५ ॥
उत्तमकालेष्वन्यतमे दिनत्रये पवित्रारोपणं कार्यमित्याह—सम्पाद्यमिति । सम्पाद्यं
= कर्तव्यमित्यर्थः । तन्मध्ये उत्तमादिकालत्रयमध्ये, यागपूरकं = भगवदाराधनच्छिद्र-
पूरकमित्यर्थः, पौर्णिमाद्युपलक्षिते = पौर्णमास्या एकादश्या संक्रान्त्या वाऽन्वित
इत्यर्थः । प्रातिसरीयकं = पावित्रकमित्यर्थः ॥ १४-१५ ॥
तीन दिन के उत्तम काल में किसी भी उत्तम दिन पवित्रारोपण विधेय है ।
इस उत्तमादिकालत्रय के मध्य में भगवदाराधन में होने वाले छिद्र की पूर्ति के लिये
याग तथा पौर्णमासी एकादशी अथवा संक्रान्ति काल में प्रतिसरानुष्ठान (पवित्रा-
रोपण) भी विधेय है ॥ १४-१५ ॥
पवित्रदिवसाख्य कर्मकथनम्
दशम्यामर्चनं कृत्वा हुत्वाग्निं च निशामुखे ।
आनिमन्त्र्य च देवेशं धूपं दत्त्वाऽर्घ्यपूर्वकम् ॥ १६ ॥