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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 837 में से

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पृष्ठ 270

नवमः परिच्छेदः २११
सर्वे बीजाः कारणवत् पूर्वोक्तविशाखयूपवत्, मूर्ध्ना अनुस्वारेण योजनीयाः ।
प्रणवाद्या नमोन्ताश्च ज्ञेयाः । तथा चैषां प्रयोगः—
ॐ नं नमः, ॐ खं नमः, ॐ ऊं नमः, ॐ हं नमः, ॐ टं नमः, ॐ कं नमः,
ॐ सं नमः, ॐ उं नमः, ॐ औं नमः, ॐ णं नमः, ॐ डं नमः, ॐ यं नमः, ॐ
तं नमः, ॐ शं नमः, ॐ नं नमः, ॐ अं नमः, ॐ जं नमः, ॐ टं नमः, ॐ लं
नमः, ॐ गं नमः, ॐ ढं नमः, ॐ ठं नमः, ॐ पं नमः, ॐ यं नमः, ॐ दं नमः,
ॐ रं नमः, ॐ वं नमः, ॐ लं नमः, ॐ धं नमः, ॐ मं नमः, ॐ ङं नमः, ॐ चं
नमः, ॐ अं नमः, ॐ फं नमः, ॐ रं नमः, ॐ ऋं नमः, ॐ थं नमः, ॐ षं नमः ।
इत्यष्टत्रिंशद् बीजानि ॥ ६६-७६ ॥
अब बीजोद्धार का क्रम कहते हैं—तन्मध्यात् ...... तेजसाऽतीव दुर्भराः
(९.६६-७६) अक्षात् उदवस्थमक्षरं अर्थात् नकार । इन्हें अनुस्वार से भूषित करे
नं यह सर्वेश्वर विशाख का बीज हुआ । इसी को जब विसर्ग सहित कर दिया जाय
तब अब्जनाभ का बीज हो जायगा । ध्रुव बीज नेमि वर्ग से द्वितीय (खकार) है ।
(ॐ खं नमः) अनन्तबीज अर से षष्ठाक्षर अकार ॐ अं नमः । इसी क्रम से
पातालशयन बीजान्त बीजों का आहरण करे । इन सभी बीजाक्षरों को (पूर्वोक्त
विशाखयूप के समान) मूर्ध्ना अनुस्वार से युक्त करना चाहिये ।
मन्त्र का स्वरूप इस प्रकार है—ॐ नं नमः (१), ॐ खं नमः (२), ॐ
ऊं नमः (३), ॐ हं नमः (४), ॐ टं नमः (५), ॐ कं नमः (६), ॐ सं
नमः (७), ॐ उं नमः (८), ॐ औं नमः (९), ॐ णं नमः (१०), ॐ डं
नमः (११), ॐ यं नमः (१२), ॐ तं नमः (१३), ॐ शं नमः (१४), ॐ
नं नमः (१५), ॐ अं नमः (१६), ॐ जं नमः (१७), ॐ टं नमः (१८),
ॐ लं नमः (१९), ॐ गं नमः (२०), ॐ ढं नमः (२१), ॐ ठं नमः
(२२), ॐ पं नमः (२३), ॐ यं नमः (२४), ॐ दं नमः (२५), ॐ रं
नमः (२६), ॐ वं नमः (२७), ॐ लं नमः (२८), ॐ धं नमः (२९), ॐ
मं नमः (३०), ॐ ङं नमः (३१), ॐ चं नमः (३२), ॐ अं नमः (३३),
ॐ फं नमः (३४), ॐ रं नमः (३५), ॐ ऋं नमः (३६), ॐ थं नमः
(३७), ॐ षं नमः (३८) । ये ३८ बीजाक्षर हैं ॥ ६६-७६ ॥
पद्मनाभादयो देवा वाच्यास्तेषां क्रमेण तु ।
पद्मनाभो ध्रुवोऽनन्तः शक्त्यात्मा मधुसूदनः ॥ ७७ ॥
विद्याधिदेवः कपिलो विश्वरूपो विहङ्गमः ।
क्रोडात्मा वडवावक्त्रो धर्मो वागीश्वरस्तथा ॥ ७८ ॥
देव एकार्णवशियः कूर्मः पातालधारकः ।
वाराहो नरसिंहश्चाप्यमृताहरणस्तु वै ॥ ७९ ॥