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सर्वकोश
सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)

Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary

भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद द्वारा

DevanagariHindipublished837 पृष्ठ

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पृष्ठ 245

१८६ सात्वतसंहिता
परत्वमनिरुद्धस्य प्राप्ते चावसरे स्मरेत् ॥ ११३ ॥
तदाकारं हृषीकेशं पद्मोदरगतं स्मरेत् ।
इष्ट्वा सम्यग्विधानेन चक्रारस्थं यथा पुरा ॥ ११४ ॥
अत्र राजोपचारैस्तु षट्पदाभैस्तु चाऽर्चनम् ।
पुष्पौदनाम्बरैः कुर्यादभावादञ्जनादिना ॥ ११५ ॥
पिञ्जरीकृत्य यत्नेन देवाय विनिवेद्य च ।
कृष्णागुरुविमिश्रं च लेपनं चात्र कुङ्कुमम् ॥ ११६ ॥
धौतायसमयं पात्रं मणिभिश्चासितैश्चितम् ।
सम्पूर्णं च तिलैः कृष्णैः पूजान्ते विनिवेद्य च ॥ ११७ ॥
सम्यक् तदर्चनं कृत्वा यथासम्पत्ति भक्तितः ।
तृतीयं प्रीणयेत् प्राग्वत् प्रद्युम्नो मेऽस्तु वै गतिः ॥ ११८ ॥
अथ त्रिविक्रमादिमन्त्रत्रयेण भाद्रपदशुक्लदशम्यन्तं व्रतानुष्ठानम्, तदारभ्य
हृषीकेशमन्त्रेण व्रतारम्भम्, हृषीकेशादित्रिककारणभूतानिरुद्धस्य कृष्णवर्णत्वे कृष्ण-
वर्णैरेव गन्धपुष्पवस्त्ररत्नफलादिभिरर्चनम्, केषाञ्चित् कृष्णवर्णानामलाभेऽप्यञ्जनादिना
तत्कृष्णीकरणम्, कृष्णतिलपूरितधूपपात्रमात्रादानम्, गुर्वर्चनम्, ततः पूर्वोक्तरीत्या
प्रद्युम्नप्रीणनं चाह—(अत्र राजोपचारैरिति चतुर्भिः ? अथ त्रिविक्रममिति सप्तभिः) ।
सम्यक् तदर्चनं कृत्वेत्यत्र तदर्चनं गुर्वर्चनमित्यर्थः ॥ ११२-११८ ॥
अब त्रिविक्रमादि मन्त्र त्रय के साथ भाद्र शुक्ल दशमी पर्यन्त व्रतानुष्ठान
कहते हैं—इसके बाद त्रिविक्रम, वामन एवं श्रीधर का तीन महीने तक, जब तक
आगे वाली शुक्ल पक्ष की दशमी न आ जाय तब तक पूजन करे ॥ ११२ ॥
उसके आदि में हृषीकेश मन्त्र से समस्त कार्य करे । फिर परस्वरूप
अनिरुद्ध का और अवसर प्राप्त होने पर उनके आकार वाले हृषीकेश का कमल
के मध्य में ध्यान करे ॥ ११३ ॥
पूर्व की भाँति विधानपूर्वक पूजन कर चक्र के अरे में सपत्नीक उनका ध्यान
करे और राजोपचार से काले पदार्थों द्वारा उनका अर्चन करे । काले पुष्प, काला
ओदन और काले वस्त्रों से उनका पूजन करे । इनके अभाव में गन्ध, पुष्पादि
वस्तुओं से अञ्जनादि से रंग कर उसे काला बना कर पूजन करे । फिर कृष्णागुरु
विमिश्रित लेपन, कुङ्कुम एवं घृत को तथा काले मणियों को और काले तिलों को
किसी काले लौह पात्र में स्थापित कर दान देवें । इस प्रकार भक्तिपूर्वक अपनी
सम्पत्ति के अनुसार पूजन करे । फिर 'प्रद्युम्नो मेऽस्तु वै गतिः' इस मन्त्र से प्रद्युम्न
से प्रार्थना करे ॥ ११३-११८ ॥
ततो मासानुमासं च हृषीकेशादनन्तरम् ।