सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३४ ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ जैमिनीय-
पञ्चम पक्षमेंभी क्या दोषाभावासहकृत ज्ञानसामग्रीजन्यको ज्ञानसामग्रीमात्र
जन्यत्व कहते हो किंवा दोषाभाव सहकृत ज्ञानसामग्रीजन्यको ? प्रथमपक्षको परतः
प्रामाण्यवादियोंने परतः प्रामाण्य माना है । द्वितीयपक्षमें दोषाभावसहकृत होनेसे
सामग्रीमेंभी सहकृतत्व हो जायगा तो अन्वयव्यतिरेकवश दोषाभावका कारणत्व
दुर्निवार होगा । यदि कहो अभाव कारण नही होता तो क्या अभाव कार्य होता है
या नहीं ? नही मानो तो पटध्वंस न होनेसे पटको नित्यत्व प्रसग होगा, होता हो
तो कारण क्या अपराध किया । उदयनाचार्यनेभी कहा है जिस प्रकार भाव कार्य
कारणरूप दोनों होते हैं तिसी प्रकार अभावभी होता है ॥ ३१ ॥
तथाच प्रयोगः विमता प्रमा, ज्ञानहेत्वतिरिक्तहेत्वधीना, कार्य्य-
त्वे सति तद्विशेषत्वात् अप्रमावत्। प्रामाण्यं परतो ज्ञायते अन-
भ्यासद्दशायां सांशयिकत्वात् अप्रामाण्यवत् । तस्मादुत्प-
त्तौ ज्ञप्तौ च परतस्त्वे प्रमाणसम्भवात् स्वतः सिद्धं प्रामाण्य-
मित्येतत् पूतिकूष्माण्डायत इति चेत् तदेतदाकाशमुष्टि-
हननायते ॥ ३२ ॥
अनुमानप्रयोग विवादग्रस्त प्रमा, ज्ञानहेतुसे अतिरिक्त हेतुके अधीन है कार्यवि-
शेष होनेसे अप्रमावत्, प्रामाण्य पराधीन ज्ञानविषय हे अनभ्यासदर्शामें संशयज-
नक होनेसे अप्रामाण्यवत् । अतः उत्पत्तिमें ओर ज्ञप्तिमे प्रामाण्यको परतस्त्व होनेसे
स्वतः सिद्धत्वकथन सडेकूष्मांडके समान है इत्यादि कथनभी आकाशमें मुष्टिप्रहार
सदृश है ॥ ३२ ॥
विज्ञानसामग्रीजन्यत्वे सति तदतिरिक्तहेत्वजन्यत्वं प्रमाया
स्वतस्त्वमिति निरुक्तिसम्भवात् । अस्ति चात्रानुमानं विमता
प्रमा विज्ञानसामग्रीजन्यत्वे सति तदतिरिक्तजन्या न भवति
अप्रमात्वानधिकरणत्वात् घटादिवत्। न चौदयनमनुमानं परत-
स्त्वसाधकमिति शङ्कनीयं प्रमा दोषव्यतिरिक्तज्ञानहेत्वतिरिक्त-
जन्या न भवति ज्ञानत्वादप्रमावदिति प्रतिसाधनग्रस्तत्वात्
ज्ञानसामग्रीमात्रादेव प्रमोत्पत्तिसंभवे तदतिरिक्तस्य गुणस्य
दोषाभावस्य वा कारणत्वकल्पनायां कल्पनागौरवप्रस-
ङ्गाच्च ॥ ३३ ॥