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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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पृष्ठ 238

ॅदर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( २३१ )
लोगी दशवार उच्चारण किया ऐसी प्रतीति न होगी द्वितीयपक्षमे स्वाभाविक भेद-
सिद्धि अन्योपाधिभेदसे स्वाभाविक ऐक्यका विघात नहीं होगा आकाशमेभी घटादि
उपाधिभेदम्स स्वाभाविक भेद होता है उसमे व्यावृत्ति नादमूलक है । आचार्योने
कहा है जाति माननेसे जो प्रयोजन है वह वर्णसेभी सिद्ध होता है व्यक्तिलाभ नादसे
होगा अतः जात्याश्रयण व्यर्थ है ( स एव अय गकारः ) ऐसी प्रत्यभिज्ञा वर्णावि-
षयमे निर्बाध विद्यमान है तो वही प्रत्यभिज्ञा सम्पूर्ण अनित्यतानुमानको
बाधती है ॥ २६ ॥
एतेनेदमपास्तम् । यदवादि वागीश्वरेण मानमनोहरे अनित्यः
शब्दः इन्द्रियविशेषगुणत्वाच्चक्षूरूपवदिति। शब्दद्रव्यत्ववादिनां
प्रत्यक्षसिद्धेः ध्वन्यंशे सिद्धसाधनत्वाच्च अश्रावणत्वोपाधिबा-
धितत्वाच्च ॥ उदयनस्तु आश्रयाप्रत्यक्षत्वेऽप्यभावस्य प्रत्य-
क्षतां महता प्रबन्धेन प्रतिपादयन् निवृत्तः कोलाहल उत्पन्नः
शब्द इति व्यवहाराचरणे कारणं प्रत्यक्षं शब्दानित्यत्वे प्रमा-
णयति स्म ॥ सोऽपि विरुद्धधर्मसंसर्गस्य औपाधिकत्वोपपा-
दनन्यायेन दत्तरक्तवलिनेव तालः समापोढि । नित्यत्वे सर्वदो-
पलब्धानुपलब्धिप्रसङ्गो यो न्यायभूषणकारोक्तः सोऽपि ध्वनि-
संस्कृतस्योपलम्भाभ्युपगमात् प्रतिक्षिप्तः ॥ २७ ॥
इससे शब्दको पक्षकर रूपदृष्टान्तप्रदर्शनपूर्वक इन्द्रियविशेष गुणत्वहेतुसं अनि-
त्यतासाधन जो वागीश्वरने कहा, सोभी खण्डित हो गया। शब्दको द्रव्य माननेवालोके
मतमें हेतु स्वरूपासिद्ध है ध्वनिविषयमें सिद्धसाधनभी है । अश्रावणत्वरूप उपाधिसे
बाधितभी है । उदयनाचार्यने आश्रयप्रत्यक्षाभावमेंभी अभावप्रत्यक्षको महानाडम्बरसे
कहकर कोलाहल शान्त हो गया शब्द उत्पन्न हुआ इत्यादि व्यवहारका असाधारण
कारण प्रत्यक्षही शब्दानित्यत्वमें प्रमाण कहा यहभी विरुद्धधर्मसंसर्गको औपाधि-
कत्वस्वीकारवत् रक्तवालिदानके समान दत्तोत्तर है नित्यत्वमें सदा उपलब्धि या अनु-
पलब्धि दोष जो न्यायभूषणकारने कहा वहभी ध्वनिसहकृतकी उपलब्धि पक्षसेही
तिरस्कृत हो गया ॥ २७ ॥
यत्तु युगपदिन्द्रियसम्बन्धित्वेन प्रतिनियतसंस्कारकसंस्कार्य्य-
भावानुमानं तदात्मन्यनैकान्तिकमसति कलकले ततश्च वेद-