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सर्वकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 316 में से

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पृष्ठ 154

दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( १४५ )
प्रथम सूत्रका अर्थ यह है कि अथशब्द पूर्वप्रकृत शिष्यप्रश्नानन्तर्य्यका बोधक
है । गुरुका स्वरूप गणकारिकामें इस प्रकार लिखा है आठ पञ्चक और त्रिकरूप
एक गण इस प्रकार नौ गणोंके वेत्ता सस्कार करनेवाले गुरु होते हैं । लाभ, मल,
उपाय, देश, अवस्था, विशुद्धि, दीक्षाकारी, बल यह आठ पञ्चक हैं । इनमें एक
एकमें पञ्च २ भेद होनेसे पञ्चक कहाते हैं तीन वृत्ति है यद्यपि विशेष्यविशेषणका
समान लिङ्ग वचन नियम होनेसे 'तिस्रो वृत्तयः' ऐसा कहना उचित था तथापि छान्दस
होनेसे लिङ्गविपर्यय करके त्रीणि ऐसा नपुंसक लिङ्ग होगया । अब क्रमसे एक
एककी व्याख्या और भेद कहते हैं । क्रियमाण उपायका फल लाभ है उसको
ज्ञान, तप, नित्यत्व, स्थिति, शुद्धिभेदसे हरदत्ताचार्यने पाँच प्रकार कहाहै ॥ २ ॥
आत्माश्रितो दुष्टभावो मलः । स मिथ्याज्ञानादिभेदात् पञ्च-
विध । तदप्याह—“मिथ्याज्ञानमधर्मश्च सक्तिर्हेतुश्च्युतिस्तथा।
पशुत्वमूलं पञ्चैते तन्त्रे हेया विविक्षितः ॥” इति ॥ साधकस्य
शुद्धिहेतुरुपायः वासचर्यादिभेदात् पञ्चविधः । तदप्याह-
“वासचर्या जपो ध्यानं सदा रुद्रस्मृतिस्तथा । प्रतिपत्तिश्च
लाभानामुपाया पञ्च निश्चिता ॥” इति ॥ ३ ॥
आत्मवृत्तिदुष्टभाव मल है वहभी मिथ्याज्ञान, अधर्म्म, शक्ति, हेतु, च्युति
भेदसे पाँच पशुत्वका मूल है अत विवेकद्वीरा यह सब हेय है । साधककी शुद्धिके
हेतु उपायभी वासचर्या, जप, ध्यान निरन्तर रुद्रका स्मरण, लाभकी प्रतिपत्तिभेदसे
पाँच प्रकार है ॥ ३ ॥
येनार्थानुसन्धानपूर्वकं ज्ञानतपोवृद्धिं प्राप्नोति स देशो गुरुज-
नादिः । यदाह—“गुरुर्जनो गुहादेशः श्मशानं रुद्र एव च” इति॥
आलाभप्राप्तेरेकत आदौ यदवस्थानं सावस्था व्यक्तादिविशे-
षेण विशिष्टा । तदुक्तम्-‘व्यक्ताव्यक्तजपादानं निष्ठा चैव हि
पञ्चमम्, इति ॥ मिथ्याज्ञानादीनामत्यन्तव्यपोहो विशुद्धिः ।
सा प्रतियोगिभेदात् पञ्चविधा । तदुक्तम्-‘अज्ञानस्याप्यस-
ङ्गस्य हानि सङ्करस्य च । च्युतिर्हानिः पशुत्वस्य शुद्धिः
पञ्चविधा स्मृता’ इति॥ दीक्षाकारिपञ्चकं चोक्तम्-‘द्रव्यं कालः