सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)
Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary
माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा
पृष्ठ 124, कुल 316 में से
संदर्भ में पढ़ेंदर्शनम् ] भाषाटीकासमेत' । ( ११६ )
“ समार प्राप्य ” ऐसा अर्थ करते हैं वह पाण्डित्यकी पराकाष्ठा वैदिक और
लौकिक किसी कोशमें अथवा व्यवहारमें कहींभी प्राप्ति अर्थमें तृधातुका प्रयोग नहीं
दृष्टि आता ॥ ४१ ॥
तदुक्तं पाञ्चरात्ररहस्ये-“स एव करुणासिन्धुर्भगवान् भक्तव-
त्सलः । उपासकानुरोधेन भजते मूर्तिपञ्चकम् ॥ तदर्चाविभ-
वव्यूहसूक्ष्मान्तर्यामिसंज्ञकम् । यदाश्रित्यैव चिद्वर्गस्तत्तज्ज्ञेयं
प्रपद्यते ॥ पूर्वपूर्वोदितोपास्तिविशेषक्षीणकल्मषः । उत्तरोत्तर-
मूर्तीनामुपास्त्याधिकृतो भवेत् ॥ एवं ह्यहरहः श्रौतस्मार्त्तध-
र्म्मानुसारतः । उक्तोपासनया पुंसां वासुदेवः प्रसीदति ॥ प्रस-
न्नात्मा हरिर्भक्त्या निदिध्यासनरूपया । अविद्यां कर्मसङ्घात-
रूपां सद्यो निवर्त्तयेत् ॥ ततः स्वाभाविकाः पुंसां ते संसारा-
त्तिरोहिता । आविर्भवन्ति कल्याणाः सर्वज्ञत्वादयो
गुणाः ॥ ४२ ॥
अत एव पञ्चरात्रमें कहा है । भक्तप्रिय दयासागर भगवान् उपासकोंके अनु-
रोधसे पाँच प्रकारके विग्रहको धारण करते हैं । जिन मूर्तियोंकी उपासना करके
चेतनवर्ग तत्तत्प्राप्य वस्तुको प्राप्त करते हैं । पूर्व पूर्व मूर्तियोंकी उपासनासे
क्षीण पाप पुरुष उत्तरोत्तर मूर्तिकी उपासनाके अधिकारी होते हैं इसीप्रकार
प्रतिदिन श्रौतस्मार्त्तकर्मानुष्ठानयुक्तपूर्वोक्त उपासनासे वासुदेव भगवान् प्रसन्न होते
हैं । निदिध्यासनरूप भक्तिसे प्रसन्न भगवान् कर्मसङ्गतक अविद्याको शीघ्र दूर करते
हैं । तदनन्तर चेतनको संसारदशामे तिरोहित स्वाभाविक सर्वज्ञत्वादि कल्याणगु-
णजात आविर्भूत होते हैं ॥ ४२ ॥
एवं गुणा समाना स्युर्मुक्तानामीश्वरस्य च । सर्वकर्तृत्वमेवैकं
तेभ्यो देवे विशिष्यते ॥ मुक्तास्तु शेषिणि ब्रह्मण्यशेषे शेपरू-
पिण । सर्वानश्नुवते कामान् सह तेन विपश्चिता”इति ॥ ४३ ॥
इस प्रकार अपहतपाप्मत्व, सर्वज्ञत्व, सत्यकामत्वादि कल्याण गुण यह सब
मुक्त और ईश्वर दोनोंमें समान हैं केवल ईश्वरमें सृष्टिकर्तृत्व अधिक है सर्वशेषी
( स्वामी ) ब्रह्ममें शेषरूपयुक्त चेतन सम्पूर्ण कल्याण गुणको ब्रह्मके साथही
अनुभव करते हैं ॥ ४३ ॥