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सर्वकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 316 में से

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पृष्ठ 119

( ११० ) सर्वदर्शनसंग्रहः । [ रामानुज-

होगा अतएव उत्पत्ति विनाशरहित होनेसे अज और नित्य प्रकृतिवत् परिणामशील
न होनेसे शाश्वत एव पुरातन हैं । इस कारण शरीरका नाश होनेपरभी आत्माका
नाश नहीं होता है । यदि एतादृश नित्यत्व न माना जाय तो कृतप्रणाश अकृतका
आगम ( प्राप्ति ) असङ्ग होगा अतएव रागद्वेषादि शून्यको जन्माभाव न्यायसूत्रका-
रनेभी कहा है । अणुत्वभी श्रुतिसिद्ध है केशके अग्र भागके प्रथम सौ १०० टुकडे
करके पश्चात् एक एकके सौ सौ टुकडे करनेसे एक भागका जो परिमाण हो वह
जीवका परिमाण है वह जीव अनन्त ( असंख्य ) हैं । और जीवरूप पुरुष आरेकी
अग्रके समान सूक्ष्म है । आत्मा ( जीव ) अणुपरिमाण चक्षुरादि इन्द्रियोंके
अग्राह्य केवल मनसे जानने योग्य है ॥ ३४ ॥
अचिच्छब्दवाच्यं दृश्यं जडं जगत् त्रिविधं भोग्यभोगोपकर-
णभोगायतनभेदात् । तस्य जगतः कर्त्तोपादानं चेश्वरपदार्थः
पुरुषोत्तमो वासुदेवादिपदवेदनीयः । तदप्युक्तम्—"वासुदेवः
परं ब्रह्म कल्याणगुणसंयुतः । भुवनानामुपादानं कर्त्ता जीवनि-
यामक ॥" इति ॥ ३५ ॥
अचित्पदबोध्य दृश्य जडरूप जगत् तीन प्रकार हैं । भोग्य ( घटादि ) भोगोप
करण ( इन्द्रियादि ) भोगस्थान ( शरीरादि ) भेद हैं एतादृश जगत्का कर्त्ता और
उपादान ( समवाय ) कारण दोनों ईश्वर है । वह पुरुषोत्तम वासुदेव नारायणादि
शब्दवाच्य है । सत्यकामत्वादि कल्याणगुणयुक्त वासुदेवही परब्रह्म हे वह जगत्का
उपादान और कर्त्ता तथा जीवोंके अन्तर्यामी होकर नियमन करते हैं । इत्यादि पञ्च
रात्रमें प्रसिद्ध है ॥ ३५ ॥
स एव वासुदेवः परमकारुणिको भक्तवत्सलः परमपुरुषस्तदुपा-
सversionकानुगुणतत्तत्फलप्रदानाय स्वलीलावशादर्चाविभवव्यूहसू-
क्ष्मान्तर्यामिभेदेन पञ्चधाऽवतिष्ठते । तत्रार्चा नाम प्रतिमादयः ।
रामाद्यवतारा विभव । व्यूहश्चतुर्विधः वासुदेवसङ्कर्षणप्रद्युम्ना-
निरूद्धसंज्ञक । सूक्ष्मं सम्पूर्णं षड्गुणं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म ।
गुणा अपहतपाप्मत्वादयः । 'सोऽपहतपाप्मा विरजो विमृत्यु-
र्विशोको विजिघत्सः सत्यकामः सत्यसङ्कल्प ' इति श्रुते ।