संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
१२२ संस्कारविधिः
ऋतं तपः सत्यं तपः श्रुतं तपः शान्तं तपो दमस्त-
पश्शमस्तपो दानं तपो यज्ञस्तपो ब्रह्म भूर्भुवः सुवर्ब्रह्मैत-
दुपास्वैतत्तपः॥ २॥ —तैत्तिरी० प्रपा० १०। अनु० ८॥
अर्थः—हे शिष्य! जो आनन्दित, पापरहित, अर्थात् अन्याय,
अधर्माचरणरहित, न्याय-धर्माचरणसहित कर्म हैं, उन्हीं का सेवन
तू किया करना, इनसे विरुद्ध अधर्माचरण कभी मत करना।
हे शिष्य! जो तेरे माता-पिता, आचार्य आदि हम लोगों के अच्छे,
धर्मयुक्त, उत्तम कर्म हैं, उन्हीं का आचरण तू कर और जो
हमारे दुष्ट कर्म हों, उनका आचरण कभी मत कर। हे ब्रह्मचारिन्!
जो हमारे मध्य में धर्मात्मा, श्रेष्ठ ब्रह्मवित् विद्वान् हैं, उन्हीं के
समीप बैठना, संग करना और उन्हीं का विश्वास किया कर॥ १॥
हे शिष्य! तू जो यथार्थ का ग्रहण, सत्य मानना, सत्य
बोलना, वेदादि सत्यशास्त्रों का सुनना, अपने मन को अधर्माचरण
में न जाने देना, श्रोत्रादि इन्द्रियों को दुष्टाचार से रोक श्रेष्ठाचार
में लगाना, क्रोधादि के त्याग से शान्त रहना, विद्या आदि शुभ
गुणों का दान करना, अग्निहोत्रादि और विद्वानों का संग कर।
जितने भूमि, अन्तरिक्ष और सूर्यादि लोकों में पदार्थ हैं, उनका
यथाशक्ति ज्ञान कर और योगाभ्यास, प्राणायाम, एक ब्रह्म—परमात्मा
की उपासना कर। ये सब कर्म करना ही तप कहाता है॥ २॥
ऋतञ्च स्वाध्यायप्रवचने च। सत्यञ्च स्वाध्यायप्रवचने
च। तपश्च स्वाध्या०। दमश्च स्वाध्या०। शमश्च स्वाध्या०।
अग्नयश्च स्वाध्या०। अग्निहोत्रं च स्वाध्या०। सत्यमिति
सत्यवचा राथीतरः। तप इति तपोनित्यः पौरुशिष्टिः।
स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्यः। तद्धि तपस्तद्धि
तपः॥ ३॥ —तैत्तिरी० प्रपा० ७। अनु० ९॥
अर्थः—हे ब्रह्मचारिन्! तू सत्य धारण कर, पढ़ और पढ़ाया
कर और सत्योपदेश करना कभी मत छोड़, सदा सत्य बोल,
पढ़ और पढ़ाया कर। हर्ष-शोकादि छोड़, प्राणायाम-योगाभ्यास
वेदारम्भप्रकरणम् १२३
कर तथा पढ़ और पढ़ाया भी कर। अपने इन्द्रियों को बुरे कामों
से हटा अच्छे कामों में चला, विद्या का ग्रहण कर और कराया
कर। अपने अन्तःकरण और आत्मा को अन्यायाचरण से हटा
न्यायाचरण में प्रवृत्त कर और कराया कर तथा पढ़ और सदा
पढ़ाया कर। अग्निविद्या के सेवनपूर्वक विद्या को पढ़ और पढ़ाया
कर । अग्निहोत्र करता हुआ पढ़ और पढ़ाया कर। 'सत्यवादी
होना तप'—सत्यवचा राथीतर आचार्य; 'न्यायाचरण में कष्ट
सहना तप'—तपो नित्य पौरुशिष्टि आचार्य; 'और धर्म में
चलके पढ़ना-पढ़ाना और सत्योपदेश करना ही तप है' यह
नाक मौद्गल्य आचार्य का मत है और सब आचार्यों के मत
में यही पूर्वोक्त तप, यही पूर्वोक्त तप है, ऐसा तू जान ॥ ३ ॥
इत्यादि उपदेश तीन दिन के भीतर आचार्य वा बालक
का पिता करे।
तत्पश्चात् घर को छोड़ गुरुकुल में जावे। यदि पुत्र हो
तो पुरुषों की पाठशाला और कन्या हो तो स्त्रियों की पाठशाला
में भेजें। यदि घर में वर्णोच्चारण की शिक्षा यथावत् न हुई हो
तो आचार्य बालकों को और कन्याओं को स्त्री पाणिनिमुनिकृत
वर्णोच्चारणशिक्षा एक महीने के भीतर पढ़ा देवें। पुनः
पाणिनिमुनिकृत अष्टाध्यायी का पाठ पदच्छेद, अर्थसहित आठ
महीने में, अथवा एक वर्ष में पढ़ाकर, धातुपाठ और दश लकारों
के रूप सधवाना तथा दश प्रक्रिया भी सधवानी। पुनः
पाणिनिमुनिकृत लिङ्गानुशासन और उणादिगण, गणपाठ तथा
अष्टाध्यायीस्थ ण्वुल् और तृच् प्रत्ययाद्यन्त सुबन्तरूप छह महीने
के भीतर सधवा देवें। पुनः दूसरी बार अष्टाध्यायी पदार्थोंक्ति,
समास, शङ्का-समाधान, उत्सर्ग अपवाद* अन्वयपूर्वक पढ़ावें
और संस्कृतभाषण का भी अभ्यास कराते जाएँ। आठ महीने
- जिस सूत्र का अधिक विषय हो वह उत्सर्ग और जो किसी सूत्र
के बड़े विषय में से थोड़े में प्रवृत्त हो वह अपवाद कहाता है।
१२४ संस्कारविधि:
के भीतर इतना पढ़ना-पढ़ाना चाहिए।
तत्पश्चात् पतञ्जलिमुनिकृत महाभाष्य, जिसमें वर्ण
उच्चारणशिक्षा, अष्टाध्यायी, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिगण,
लिङ्गानुशासन इन छह ग्रन्थों की व्याख्या यथावत् लिखी है,
डेढ़ वर्ष में अर्थात् अठारह महीने में इसको पढ़ना-पढ़ाना। इस
प्रकार शिक्षा और व्याकरणशास्त्र को तीन वर्ष पाँच महीने वा
नौ महीने, अथवा ४ वर्ष के भीतर पूरा कर सब संस्कृतविद्या
के मर्मस्थलों को समझने के योग्य होवे।
तत्पश्चात् यास्कमुनिकृत निघण्टु निरुक्त तथा कात्यायनादि
मुनिकृत कोश डेढ़ वर्ष के भीतर पढ़के, अव्यार्थ आप्तमुनिकृत
वाच्यवाचक सम्बन्धरूप यौगिक*, योगरूढ़ि और रूढ़ि तीन
प्रकार के शब्दों के अर्थ यथावत् जानें। तत्पश्चात् पिङ्गलाचार्यकृत
पिङ्गलसूत्र छन्दोग्रन्थ भाष्यसहित तीन महीने में पढ़ और तीन
महीने में श्लोकादिरचनविद्या को सीखें। पुनः यास्कमुनिकृत
काव्यालङ्कारसूत्र, वात्स्यायनमुनिकृत भाष्यसहित आकाङ्क्षा,
योग्यता, आसत्ति और तात्पर्यार्थ अन्वयसहित पढ़के, इसी के
साथ मनुस्मृति, विदुरनीति और किसी प्रकरण में से १० सर्ग
वाल्मीकीय रामायण के, ये सब एक वर्ष के भीतर पढ़ें और
पढ़ावें तथा एक वर्ष में सूर्यसिद्धान्तादि में से किसी एक सिद्धान्त
से गणितविद्या, जिसमें बीजगणित, रेखागणित और पाटीगणित,
जिसको अङ्कगणित भी कहते हैं, पढ़ें और पढ़ावें। निघण्टु से
लेके ज्योतिषपर्यन्त वेदाङ्गों को चार वर्ष के भीतर पढ़ें।
तत्पश्चात् जैमिनिमुनिकृत सूत्र पूर्वमीमांसा व्यासमुनिकृत
व्याख्यासहित, कणादमुनिकृत वैशेषिकसूत्ररूप शास्त्र को
गौतममुनिकृत प्रशस्तपादभाष्यसहित, वात्स्यायनमुनिकृत भाष्य-
- यौगिक—जो क्रिया के साथ सम्बन्ध रक्खे। जैसे पाचक याजकादि।
योगरूढ़ि—जैसे पङ्कजादि। रूढ़ि—जैसे धन, वन इत्यादि।
वेदारम्भप्रकरणम् १२५
सहित गौतम मुनिकृत सूत्ररूप न्यायशास्त्र, व्यासमुनिकृतभाष्य-
सहित पतञ्जलिमुनिकृत योगसूत्र योगशास्त्र, भागुरिमुनिकृत-
भाष्ययुक्त कपिलाचार्यकृत सूत्रस्वरूप सांख्यशास्त्र, जैमिनि वा
बौधायन आदि मुनिकृत व्याख्यासहित व्यासमुनिकृत शारीरक-
सूत्र तथा ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय,
तैत्तिरीय, छान्दोग्य और बृहदारण्यक दश उपनिषद्,
व्यासादिमुनिकृत व्याख्यासहित वेदान्तशास्त्र, इन छह शास्त्रों को
दो वर्ष के भीतर पढ़ लेवें।
तत्पश्चात् बह्वृच् ऐतरेय ऋग्वेद का ब्राह्मण, आश्वलायनकृत
श्रौत तथा गृह्यसूत्र* और कल्पसूत्र पद-क्रम और व्याकरणादि
के सहाय से छन्द, स्वर, पदार्थ, अन्वय, भावार्थसहित ऋग्वेद
का पठन तीन वर्ष के भीतर करें। इसी प्रकार यजुर्वेद को
शतपथब्राह्मण और पदादि के सहित दो वर्ष, तथा सामब्राह्मण
और पदादि तथा गानसहित सामवेद को दो वर्ष, तथा गोपथब्राह्मण
और पदादि के सहित अथर्ववेद को दो वर्ष के भीतर पढ़ें और
पढ़ावें। सब मिलके ९ [नौ] वर्षों के भीतर चारों वेदों को
पढ़ना और पढ़ाना चाहिए।
पुनः ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद, जिसको वैद्यकशास्त्र
कहते हैं, जिसमें धन्वन्तरिजीकृत सुश्रुत और निघण्टु तथा
पतञ्जलि ऋषिकृत चरक आदि आर्षग्रन्थ हैं, इनको तीन वर्ष
के भीतर पढ़ें। जैसे सुश्रुत में शस्त्र लिखे हैं, बनाकर शरीर
के सब अवयवों को चीरके देखें तथा जो उसमें शारीरकादि
विद्या लिखी है, उसका साक्षात् करें।
तत्पश्चात् यजुर्वेद का उपवेद धनुर्वेद, जिसको शस्त्रास्त्र-
विद्या कहते हैं, जिसमें अङ्गिरा आदि ऋषिकृत ग्रन्थ हैं, जो
- ब्राह्मण वा जो सूत्र वेदविरुद्ध हिंसापरक हो, उसका प्रमाण न
करना।
१२६ संस्कारविधिः
इस समय बहुधा नहीं मिलते, तीन वर्ष में पढ़ें और पढ़ावें।
पुनः सामवेद का उपवेद गान्धर्ववेद, जिसमें नारदसंहितादि
ग्रन्थ हैं, उन्हें पढ़के स्वर, राग, रागिणी, समय, वादित्र, ग्राम,
ताल, मूर्च्छना आदि का अभ्यास यथावत् तीन वर्ष के भीतर
करें।
तत्पश्चात् अथर्ववेद का उपवेद अर्थवेद, जिसको
शिल्पशास्त्र कहते हैं, जिसमें विश्वकर्मा, त्वष्टा और मयकृत
संहिता-ग्रन्थ हैं, उनको छह वर्ष के भीतर पढ़के विमान, तार,
भूगर्भादि विद्याओं का साक्षात् करें।
शिक्षा से लेके आयुर्वेद तक इन १४ चौदह विद्याओं को
३१ इकतीस वर्षों में पढ़के, महाविद्वान् होकर अपने और सब
जगत् के कल्याण और उन्नति करने में सदा प्रयत्न किया करें॥
॥ इति वेदारम्भसंस्कारविधिः समाप्तः ॥
12
अथ समावर्त्तनसंस्कारविधिं
वक्ष्यामः
‘समावर्त्तन संस्कार’ उसे कहते हैं कि जिसमें ब्रह्मचर्यव्रत,
साङ्गोपाङ्ग वेदविद्या, उत्तम शिक्षा और पदार्थविज्ञान को पूर्ण
रीति से प्राप्त होके विवाह-विधानपूर्वक गृहाश्रम को ग्रहण करने
के लिए विद्यालय को छोड़के घर की ओर आना होता है।
इसमें प्रमाण—
वेदसमाप्तिं वाचयीत ॥
कल्याणैः सह सम्प्रयोगः ॥
स्नातकायोपस्थिताय। राज्ञे च। आचार्यश्वशुरपितृव्य-
मातुलानां च। दधनि मध्वानीय। सर्पिर्वा मध्वलाभे। विष्टरः
पाद्यमर्घ्यमाचमनीयं मधुपर्कः ॥
—यह आश्वलायनगृह्यसूत्र का वचन है।
तथा पारस्करगृह्यसूत्र में कहा है—
वेदग्ँ समाप्य स्नायाद्। ब्रह्मचर्यं वाष्टाचत्वारिंशकम्।
त्रय एव स्नातका भवन्ति—विद्यास्नातको व्रतस्नातको
विद्याव्रतस्नातकश्चेति ॥
अर्थः—जब वेदों की समाप्ति हो तब समावर्त्तनसंस्कार
करे। सदा पुण्यात्मा पुरुषों के सब व्यवहारों में साझा रक्खे।
राजा, आचार्य, श्वसुर, चाचा और मामा आदि का अपूर्वागमन
जब हो और स्नातक अर्थात् जब विद्या और ब्रह्मचर्य पूर्ण करके
ब्रह्मचारी घर को आवे, तब प्रथम पाद्यम्=पग धोने का जल,
अर्घ्यम्=मुखप्रक्षालन के लिए जल और आचमन के लिए जल
१२८ संस्कारविधिः
देके शुभासन पर बैठा, दही में मधु अथवा सहत न मिले तो
घी मिलाके, एक अच्छे पात्र में धर इन्हें मधुपर्क देना होता
है और विद्यास्नातक, व्रतस्नातक तथा विद्याव्रतस्नातक ये तीन *
प्रकार के स्नातक होते हैं। इस कारण वेद की समाप्ति और
अड़तालीस वर्ष का ब्रह्मचर्य समाप्त करके ब्रह्मचारी विद्याव्रत
स्नान करे।
तं प्रतीतं स्वधर्मेण धर्मदायहरं पितुः।
स्रग्विणं तल्प आसीनमर्हयेत् प्रथमं गवा॥
—मनु० ३।३॥
अर्थः—जो विद्वान् माता-पिता का पुत्र, शिष्य, ब्रह्मचारी
हो, वह स्वधर्म से यथावत् युक्त पितृस्थानी उस आचार्य को
उत्तम आसन पर बैठा, पुष्पमाला पहनाकर प्रथम गोदान देवे।
यथाशक्ति वस्त्र, धनादि भी देकर सत्कार करे॥
तानि॒ कल्प॑न्द् ब्रह्म॒चारी स॑लि॒लस्य॑ पृ॒ष्ठे तपो॑ऽतिष्ठत्तप्यमा॑नः
समु॒द्रे। स स्ना॒तो ब॒भ्रुः पि॑ङ्ग॒लः पृ॑थि॒व्यां ब॒हु रो॑चते॥
—अथर्व० कां० ११। प्रपा० २४। व० १६। मं० २६॥
अर्थ—जो ब्रह्मचारी समुद्र के समान गम्भीर, बड़े उत्तम
व्रत—ब्रह्मचर्य में निवास कर महातप करता हुआ वेदपठन,
वीर्यनिग्रह, आचार्य के प्रियाचरणादि कर्मों को पूरा कर पश्चात्
पृ० १३० में लिखे अनुसार स्नानविधि करके पूर्ण विद्याओं को
धरता, सुन्दर वर्णयुक्त होके पृथिवी में अनेक शुभ गुण-कर्म
और स्वभाव से प्रकाशमान होता है, वही धन्यवाद के योग्य है।
- जो केवल विद्या को समाप्त तथा ब्रह्मचर्यव्रत को न समाप्त करके
स्नान करता है वह विद्यास्नातक, जो ब्रह्मचर्यव्रत को समाप्त तथा
विद्या को न समाप्त करके स्नान करता है, वह व्रतस्नातक और
जो विद्या तथा ब्रह्मचर्यव्रत दोनों को समाप्त करके स्नान करता
है, वह विद्याव्रतस्नातक कहाता है।
समावर्त्तनप्रकरणम् १२९
इसका समय—पृष्ठ ११२-११३ तक में लिखे प्रमाणे
जानना, परन्तु जब विद्या, हस्तक्रिया, ब्रह्मचर्यव्रत भी पूरा होवे,
तभी गृहाश्रम की इच्छा स्त्री और पुरुष करें। विवाह के स्थान
दो हैं—एक आचार्य का घर दूसरा अपना घर। दोनों ठिकानों
में से किसी एक ठिकाने आगे विवाह में लिखे प्रमाणे सब
विधि करे। इस संस्कार का विधि पूरा करके पश्चात् विवाह
करे।
विधि—जो शुभ दिन समावर्त्तन का नियत करे, उस दिन
आचार्य के घर में पृ० २३ में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड आदि
बनाके सब शाकल्य और सामग्री संस्कार दिन से पूर्व दिन
में जोड़ रक्खे और स्थालीपाक* बनाके तथा घृतादि और पात्रादि
यज्ञशाला में वेदी के समीप रक्खे, पुनः पृ० २९ में लिखे प्रमाणे
यथावत् चारों दिशाओं में आसन बिछा बैठ, पृ० ९ से पृ०
२१ तक में ईश्वरोपासना, स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण करे और
जितने वहाँ पुरुष आये हों, वे भी एकाग्रचित्त होके ईश्वर के
ध्यान में मग्न होवें। तत्पश्चात् पृष्ठ ३०-३१ में लिखे प्रमाणे
अग्न्याधान, समिदाधान करके पृ० ३२ में लिखे प्रमाणे वेदी
के चारों ओर उदक-सेचन करके आसन पर पूर्वाभिमुख आचार्य
बैठके पृ० ३२ में लिखे प्रमाणे आघारावाज्यभागाहुति चार
और पृ० ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृ०
३४-३५ में लिखे प्रमाणे अष्टाज्याहुति आठ और पृ० ३३ में
लिखे प्रमाणे स्विष्टकृत् आहुति एक और प्राजापत्याहुति
एक—ये सब मिलके अठारह आज्याहुति देनी। तत्पश्चात्
ब्रह्मचारी पृ० १०० में लिखे० (ओम् अग्ने सुश्रवः०) इस मन्त्र
से कुण्ड का अग्नि कुण्ड के मध्य में इकट्ठा करे। तत्पश्चात्
पृ० १०० में लिखे प्रमाणे (ओम् अग्नये समिध०) इस मन्त्र
- जोकि पूर्व पृष्ठ २४ में लिखे प्रमाणे भात आदि बनाकर रक्खा
हो।
१३० संस्कारविधिः
से कुण्ड में तीन समिधा होमकर, पृ० १०१ में लिखे प्रमाणे
(ओम् तनूपा०) इत्यादि सात मन्त्रों से दक्षिण हस्ताञ्जलि आग
पर थोड़ी-सी तपा, उस जल से मुखस्पर्श और तत्पश्चात् पृ०
१०१ में लिखे प्रमाणे (ओं वाक् च म०) इत्यादि मन्त्रों से
उक्त प्रमाणे अङ्ग-स्पर्श करे। पुनः सुगन्धादि औषधयुक्त जल
से भरे हुए आठ घड़े वेदी के उत्तरभाग में जो पूर्व से रक्खे
हुए हों, उन घड़ों में से—
ओं ये अप्स्वन्तरग्नयः प्रविष्टा गोह्य उपगोह्यो मयूषो
मनोहास्खलो विरुजस्तनूदूषुरिन्द्रियहा तान् विजहामि यो
रोचनस्तमिह गृह्णामि ॥
इस मन्त्र को पढ़, एक घड़े को ग्रहण करके, उस घड़े
में से जल लेके—'
ओं तेन मामभिसिञ्चामि श्रियै यशसे ब्रह्मणे
ब्रह्मवर्चसाय ॥
इस मन्त्र को बोलके स्नान करना। तत्पश्चात् उपरिकथित
(ओं ये अप्स्वन्तर०) इस मन्त्र को बोलके दूसरे घड़े को ले,
उसमें से लोटे में जल लेके—
ओं येन श्रियमकृणुतां येनावमृशताथँ सुराम्।
येनाक्ष्यावभ्यसिञ्चितां यद्द्वां तदश्विना यशः ॥
इस मन्त्र को बोलके स्नान करना।
तत्पश्चात् पूर्ववत् ऊपर के (ओं ये अप्स्वन्तर०) इसी
मन्त्र का पाठ बोलके वेदी के उत्तर में रक्खे घड़ों में से तीन
घड़ों को लेके पृ० ९४-९५ में लिखे हुए (ओं आपो हि ष्ठा०)
इन तीन मन्त्रों को बोलके, उन घड़ों के जल से स्नान करना।
तत्पश्चात् आठ घड़ों में से रहे हुए तीन घड़ों को लेके (ओं
आपो हि ष्ठा०) इन्हीं तीन मन्त्रों को बोलके स्नान करे। पुनः—
समावर्त्तनप्रकरणम् १३१
ओम् उदु॑त्त॒मं व॑रु॒ण॒ पाश॑म॒स्मदवा॑ध॒मं वि म॑ध्य॒मँ श्र॑थाय ।
अथा॑ व॒यमा॑दित्य व्र॒ते तवाना॑गसो॒ अदि॑तये स्याम॒ ॥
इस मन्त्र को बोलके ब्रह्मचारी अपनी मेखला और दण्ड
को छोड़े। तत्पश्चात् वह स्नातक ब्रह्मचारी सूर्य के सम्मुख खड़ा
रहकर—
ओम् उद्यन् भ्राजभृष्णुरिन्द्रो मरुद्भिरस्थात् प्रातर्याव-
भिरस्थाद् दशसनिरसि दशसनिं मा कुर्वाविदन् मा गमय।
उद्यन् भ्राजभृष्णुरिन्द्रो मरुद्भिरस्थाद् दिवा यावभिर-
स्थाच्छतसनिरसि शतसनिं मा कुर्वाविदन् मा गमय। उद्यन्
भ्राजभृष्णुरिन्द्रो मरुद्भिरस्थात् सायं यावभिरस्थात् सहस्त्र-
सनिरसि सहस्त्रसनिं मा कुर्वाविदन् मा गमय॥
इस मन्त्र से परमात्मा का उपस्थान—स्तुति करके, तत्पश्चात्
दही वा तिल प्राशन करके, जटा-लोम और नख वपन अर्थात्
छेदन कराके—
ओम् अन्नाद्याय व्यूहध्वं सोमो राजायमागमत्।
स मे मुखं प्रमाक्ष्य॑ते यशसा च भगेन च॥
इस मन्त्र को बोलके ब्रह्मचारी उदुम्बर की लकड़ी से
दन्तधावन करे। तत्पश्चात् सुगन्धित द्रव्य शरीर पर मलके शुद्ध
जल से स्नान कर, शरीर को पोंछ, अधोवस्त्र अर्थात् धोती वा
पीताम्बर धारण करके, सुगन्धयुक्त चन्दनादि का अनुलेपन करे।
तत्पश्चात् चक्षु, मुख और नासिका के छिद्रों का—
ओं प्राणापानौ मे तर्पय चक्षुर्मे तर्पय श्रोत्रं मे तर्पय॥
इस मन्त्र से स्पर्श करके, हाथ में जल ले, अपसव्य और
दक्षिणमुख होके—
ओं पितरः शुन्धध्वम्॥
इस मन्त्र से जल भूमि पर छोड़के, सव्य होके—
१३२ संस्कारविधिः
ओम् सुचक्षा अहमक्षीभ्यां भूयासँः सुवर्चा मुखेन।
सुश्रुत् कर्णाभ्यां भूयासम् ॥
इस मन्त्र का जप करके—
ओं परिधास्यै यशोधास्यै दीर्घायुत्वाय जरदष्टिरस्मि ।
शतं च जीवामि शरदः पुरूची रायस्पोषमभिसंव्ययिष्ये ॥
इस मन्त्र से सुन्दर, अति श्रेष्ठ वस्त्र धारण करके—
ओम् यशसा मा द्यावापृथिवी यशसेन्द्राबृहस्पती ।
यशो भगश्च मा विदद् यशो मा प्रतिपद्यताम् ॥
इस मन्त्र से उत्तम उपवस्त्र धारण करके—
ओं या आहरज्जमदग्निः श्रद्धायै कामायेन्द्रियाय ।
ता अहं प्रतिगृह्णामि यशसा च भगेन च ॥
इस मन्त्र से सुगन्धित पुष्पों की माला लेके—
ओं यद्यशोऽप्सरसामिन्द्रश्चकार विप्रुं पृथु ।
तेन सङ्ग्रथिताः सुमनस आबध्नामि यशो मयि ॥
इस मन्त्र से धारण करनी। पुनः शिरोवेष्टन अर्थात् पगड़ी,
दुपट्टा और टोपी आदि अथवा मुकुट हाथ में लेके ९६ पृष्ठ
में लिखे प्रमाणे (युवा सुवासाः०) इस मन्त्र से धारण करे।
उसके पश्चात् अलङ्कार लेके—
ओम् अलङ्करणमसि भूयोऽलङ्करणं भूयात् ॥
इस मन्त्र से धारण करे। और—
ओं वृत्रस्यासि कनीनकश्चक्षुर्दा असि चक्षुर्मे देहि ॥
इस मन्त्र से आँख में अञ्जन करना। तत्पश्चात्—
ओं रोचिष्णुरसि ॥
इस मन्त्र से दर्पण में मुख अवलोकन करे। तत्पश्चात्—
ओं बृहस्पतेश्छदिरसि पाप्मनो मामन्तर्धेहि तेजसो
यशसो माऽन्तर्धेहि ॥
समावर्त्तनप्रकरणम् १३३
इस मन्त्र से छत्र धारण करे। पुनः—
ओं प्रतिष्ठे स्थो विश्वतो मा पातम्॥
इस मन्त्र से उपानह्=पादवेष्टन=पगरखा जिसको जोड़ा भी
कहते हैं, धारण करे। तत्पश्चात्—
ओं विश्वाभ्यो मा नाष्ट्राभ्यस्परिपाहि सर्वतः॥
इस मन्त्र से बाँस आदि की एक सुन्दर लकड़ी हाथ में
धारण करनी।
तत्पश्चात् जब आचार्यकुल से अपना पुत्र घर को आवे,
तब ब्रह्मचारी के माता-पिता आदि, उसे बड़े मान्य, प्रतिष्ठा,
उत्सव, उत्साह से अपने घर पर ले-आवें। घर पर लाके उसके
पिता-माता सम्बन्धी बन्धु आदि ब्रह्मचारी का सत्कार पृ० १४९-
१५३ में लिखे प्रमाणे [पाद्य-अर्घ्य-मधुपर्क द्वारा] करें।
पुनः उस संस्कार में आये हुए आचार्य आदि को उत्तम
अन्न-पानादि से सत्कारपूर्वक भोजन कराके और वह ब्रह्मचारी
और उसके माता-पितादि आचार्य को उत्तम आसन पर बैठा,
पूर्वोक्त प्रकार मधुपर्क कर, सुन्दर पुष्पमाला, वस्त्र, गोदान, धन
आदि की दक्षिणा यथाशक्ति देके, सबके सामने आचार्य के
जो उत्तम गुण हों, उनकी प्रशंसा कर और विद्यादान की कृतज्ञता
सबको सुनावे—
'सुनो भद्रजनो! इन महाशय आचार्य ने मुझपर बड़ा उपकार
किया है, जिन्होंने मुझे पशुता से छुड़ां, उत्तम. विद्वान् बनाया
है, उसका प्रत्युपकार मैं कुछ भी नहीं कर संकता। इसके बदले
में अपनें आचार्य को अनेक धन्यवाद दे, नमस्कार कर, प्रार्थना
करता हूँ कि जैसे आपने मुझे उत्तम शिक्षा और विद्यादान देके
कृतकृत्य किया, उसी प्रकार अन्य विद्यार्थियों को भी कृतकृत्य
करेंगे और जैसे आपने मुझे विद्या देके आनन्दित किया है, वैसे
मैं भी अन्य विद्यार्थियों को कृतकृत्य और आनन्दित करता रहूँगा
और आपके किये उपकार को कभी न भूलूँगा। सर्वशक्तिमान्
१३४ संस्कारविधिः
जगदीश्वर आप, मुझ और सब पढ़ने-पढ़ानेवाले तथा सब संसार
पर अपनी कृपा-दृष्टि से सबको सभ्य, विद्वान्, शरीर और आत्मा
के बल से युक्त और परोपकारादि शुभ कर्मों की सिद्धि करने-
कराने में चिरायु, स्वस्थ, पुरुषार्थी, उत्साही करें कि जिससे
इस परमात्मा की सृष्टि में उसके गुण-कर्म-स्वभाव के अनुकूल
अपने गुण-कर्म-स्वभावों को करके धर्मार्थ, काम और मोक्ष
की सिद्धि कर-कराके सदा आनन्द में रहें॥'
॥ इति समावर्त्तनसंस्कारविधिः समाप्तः ॥
13
अथ विवाहसंस्कारविधिं वक्ष्यामः
'विवाह' उसे कहते हैं कि जो पूर्ण ब्रह्मचर्यव्रत द्वारा विद्या-
बल को प्राप्त तथा सब प्रकार से शुभ गुण-कर्म-स्वभावों में
तुल्य, परस्पर प्रीतियुक्त होके निम्नलिखित प्रमाणे सन्तानोत्पत्ति
और अपने-अपने वर्णाश्रम के अनुकूल उत्तम कर्म करने के
लिए स्त्री और पुरुष का सम्बन्ध होता है। इसमें प्रमाण—
उदगयन आपूर्यमाणपक्षे पुण्ये नक्षत्रे* चौलकर्मोपनयन-
गोदानविवाहाः ॥ १ ॥
सार्वकालमेके विवाहम् ॥ २ ॥
—यह आश्वलायनगृह्यसूत्र और—
आवसथ्याधानं दारकाले ॥ ३ ॥ इत्यादि पारस्कर और—
पुण्ये नक्षत्रे दारान् कुर्वीत ॥ ४ ॥
लक्षणप्रशस्तान् कुशलेन ॥ ५ ॥ इत्यादि गोभिलीयगृह्यसूत्र
और इसी प्रकार शौनकगृह्यसूत्र में भी है॥
अर्थः—उत्तरायण शुक्लपक्ष अच्छे दिन अर्थात् जिस दिन
प्रसन्नता हो, उस दिन विवाह करना चाहिए ॥ १ ॥
और कितने ही आचार्यों का ऐसा मत है कि सब काल
में विवाह करना चाहिए ॥ २ ॥
जिस अग्नि का स्थापन विवाह में होता है, उसका
'आवसथ्य' नाम है ॥ ३ ॥
प्रसन्नता के दिन सर्वथा शुभ गुणादि से उत्तम जो स्त्री
हो, उससे पाणिग्रहण करना चाहिए ॥ ४-५ ॥
* यह नक्षत्रादि का विचार कल्पनायुक्त है, इससे प्रमाण नहीं।
१३६ संस्कारविधिः
इसका समय-पृष्ठ ११२-११५ तक में लिखे प्रमाणे
जानना चाहिए। वधू और वर की आयु, कुल, वास्तव्य स्थान,
शरीर और स्वभाव की परीक्षा अवश्य करें, अर्थात् दोनों संज्ञान
और विवाह की इच्छा करनेवाले हों। स्त्री की आयु से वर
की आयु न्यून-से-न्यून ड्योढ़ी और अधिक-से-अधिक दूनी
होवे। परस्पर कुल की परीक्षा भी करनी चाहिए। इसमें प्रमाण-
वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम्।
अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशेत् ॥ १ ॥
गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधि ।
उद्वहेत द्विजो भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम् ॥ २ ॥
असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः ।
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ॥ ३ ॥
महान्त्यपि समृद्धानि गोऽजाविधनधान्यतः ।
स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् ॥ ४ ॥
हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शसम्।
क्षय्यामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च ॥ ५ ॥
नोद्वहेत्कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम् ।
नालोमिकां नातिलोमां न वाचाटां न पिङ्गलाम् ॥ ६ ॥
नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम् ।
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम् ॥ ७ ॥
अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम् ।
तनुलोमकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत् स्त्रियम् ॥ ८ ॥
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ ९ ॥
विवाहप्रकरणम् १३७
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम्।
आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः ॥ १० ॥
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते।
अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ॥ ११ ॥
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः।
कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते ॥ १२॥
सह नौ चरतां धर्ममिति वाचानुभाष्य च।
कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ॥ १३ ॥
ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः।
कन्याप्रदानं विधिवदासुरो धर्म उच्यते ॥ १४ ॥
इच्छयाऽन्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च।
गान्धर्वः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसम्भवः ॥ १५ ॥
हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात्।
प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ॥ १६ ॥
सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति।
स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ १७ ॥
ब्राह्मादिषु विवाहेषु चतुर्ष्वेवानुपूर्वशः।
ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते शिष्टसंमताः ॥ १८ ॥
रूपसत्त्वगुणोपेता धनवन्तो यशस्विनः।
पर्याप्तभोगा धर्मिष्ठा जीवन्ति च शतं समाः ॥ १९ ॥
इतरेषु तु शिष्टेषु नृशंसानृतवादिनः।
जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्मद्विषः सुताः ॥ २० ॥
अनिन्दितैः स्त्रीविवाहैरनिन्द्या भवति प्रजा।
निन्दितैर्निन्दिता नृणां तस्मान्निन्द्यान् विवर्जयेत् ॥ २१ ॥
१३८ संस्कारविधिः
अर्थ—ब्रह्मचर्य से चार, तीन, दो अथवा एक वेद को
यथावत् पढ़, अखण्डित ब्रह्मचर्य का पालन करके गृहाश्रम का
धारण करे ॥ १ ॥
यथावत् उत्तम रीति से ब्रह्मचर्य और विद्या को ग्रहण कर,
गुरु की आज्ञा से स्नान करके ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य अपने
वर्ण की उत्तम लक्षणयुक्त स्त्री से विवाह करे ॥ २ ॥
जो स्त्री माता की छह पीढ़ी और पिता के गोत्र की न
हो, वही द्विजों के लिए विवाह करने में उत्तम है ॥ ३ ॥
विवाह में नीचे लिखे हुए दश कुल, चाहे वे गाय आदि
पशु, धन और धान्य से कितने ही बड़े हों, उन कुलों की कन्या
के साथ विवाह न करे ॥ ४ ॥
वे दश कुल ये हैं। एक—जिस कुल में उत्तम क्रिया न
हों। दूसरा—जिस कुल में कोई भी उत्तम पुरुष न हो।
तीसरा—जिस कुल में कोई विद्वान् न हो। चौथा—जिस कुल
में शरीर के ऊपर बड़े-बड़े लोम हों। पाँचवाँ—जिस कुल में
बवासीर हो। छठा—जिस कुल में क्षयी (राज्यक्ष्मा) रोग हो।
सातवाँ—जिस कुल में अग्निमन्दता से आमाशय रोग हो।
आठवाँ—जिस कुल में मृगी रोग हो। नववाँ—जिस कुल में
श्वेतकुष्ठ हो और दसवाँ—जिस कुल में गलितकुष्ठ आदि रोग
हों—उन कुलों की कन्या अथवा उन कुलों के पुरुषों से विवाह
कभी न करे ॥ ५ ॥
पीले वर्णवाली, अधिक अङ्गवाली जैसी छंगुली आदि,
रोगवती, जिसके शरीर पर कुछ भी लोम न हों और जिसके
शरीर पर बड़े-बड़े लोम हों, व्यर्थ अधिक बोलनेवाली और
जिसके पीले बिल्ली के सदृश नेत्र हों ॥ ६ ॥
तथा जिस कन्या का (ऋक्ष) नक्षत्र पर नाम अर्थात् रेवती,
रोहिणी इत्यादि, (वृक्ष) चम्पा, चमेली आदि, (नदी) जिसका
गङ्गा, यमुना इत्यादि, (अन्त्य) चाण्डाली आदि, (पर्वत)
जिसका विन्ध्याचला इत्यादि, (पक्षी) पक्षी पर, अर्थात् कोकिला,
विवाहप्रकरणम् १३९
हंसा इत्यादि, (अहि), अर्थात् उरगा, भोगिनी इत्यादि, (प्रेष्य)
दासी इत्यादि और जिस कन्या का (भीषण) कालिका, चण्डिका
इत्यादि नाम हो, उससे विवाह न करे॥७॥
किन्तु जिसके सुन्दर अङ्ग, उत्तम नाम, हंस और हस्तिनी
के सदृश चालवाली, जिसके सूक्ष्म लोम, सूक्ष्म केश और सूक्ष्म
दाँत हों, जिसके सब अङ्ग कोमल हों, उस स्त्री से विवाह
करे॥८॥
ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और
पैशाच, ये आठ प्रकार के विवाह होते हैं॥९॥
पहला- ब्राह्म- कन्या के योग्य सुशील, विद्वान् पुरुष
का सत्कार करके कन्या को वस्त्रादि से अलंकृत करके, उत्तम
पुरुष को बुला, अर्थात् जिसको कन्या ने भी पसन्द किया हो,
उसको देना, वह 'ब्राह्म' विवाह कहाता है॥१०॥
दूसरा-विस्तृत यज्ञ में बड़े-बड़े विद्वानों का वरण कर,
उसमें कर्म करानेवाले विद्वान् को वस्त्र-आभूषण आदि से कन्या
को सुशोभित करके देना, वह 'दैव' विवाह है॥११॥
तीसरा- एक गाय, बैल का जोड़ा अथवा दो जोड़े* वर
से लेके धर्मपूर्वक कन्यादान करना, वह 'आर्ष' विवाह है॥१२॥
चौथा-कन्या और वर को यज्ञशाला में विधि करके
सबके सामने तुम दोनों मिलके गृहाश्रम के कर्मों को यथावत्
करो, ऐसा कहकर दोनों की प्रसन्नतापूर्वक पाणिग्रहण होना,
वह 'प्राजापत्य' विवाह कहाता है। ये चार विवाह उत्तम
हैं॥१३॥
पाँचवाँ-वर की जातिवालों और कन्या को यथाशक्ति
धन देकर होम आदि विधि कर कन्या देना, 'आसुर' विवाह
- यह बात मिथ्या है, क्योंकि आगे मनुस्मृति में निषेध किया है
और युक्तिविरुद्ध भी है, इसलिए कुछ भी न ले-देकर दोनों की
प्रसन्नता से पाणिग्रहण होना आर्ष विवाह है।
१४० संस्कारविधिः
कहाता है॥१४॥
छठा—वर और कन्या की इच्छा से दोनों का संयोग होना
और अपने मन में मान लेना कि हम दोनों स्त्री-पुरुष हैं, यह
काम से हुआ ‘गान्धर्व’ विवाह कहाता है॥१५॥
सातवाँ—हनन, छेदन, अर्थात् कन्या के रोकनेवालों का
विदारण कर क्रोशती, रोती, कम्पती और भयभीत हुई कन्या
को बलात्कार हरण करके विवाह करना, वह ‘राक्षस’ विवाह
है॥१६॥
आठवाँ—जो सोती, पागल हुई वा नशा पीकर उन्मत्त
हुई कन्या को एकान्त पाकर दूषित कर देना, यह सब विवाहों
में नीच-से-नीच महानीच, दुष्ट, अतिदुष्ट ‘पैशाच’ विवाह
है॥१७॥
ब्राह्म, दैव, आर्ष और प्राजापत्य इन चार विवाहों में
पाणिग्रहण किये हुए स्त्री-पुरुषों से जो सन्तान उत्पन्न होते हैं,
वे वेदादिविद्या से तेजस्वी, आप्त पुरुषों के सम्मत, अत्युत्तम
होते हैं॥१८॥
वे पुत्र वा कन्या सुन्दर रूप, बल, पराक्रम, शुद्ध बुद्ध्यादि
उत्तम गुणयुक्त, बहु धनयुक्त, पुण्यकीर्तिमान् और पूर्ण भोग के
भोक्ता, अतिशय धर्मात्मा होकर १०० वर्ष तक जीते हैं॥१९॥
इन चार विवाहों से जो बाकी रहे चार आसुर, गान्धर्व,
राक्षस और पैशाच, इन चार दुष्ट विवाहों से उत्पन्न हुए सन्तान
निन्दित कर्मकर्त्ता, मिथ्यावादी, वेदधर्म के द्वेषी, बड़े नीच
स्वभाववाले होते हैं॥२०॥
इसलिए मनुष्यों को योग्य है कि जिन निन्दित विवाहों
से नीच प्रजा होती हैं, उनका त्याग और जिन उत्तम विवाहों
से उत्तम प्रजा होती हैं, उन्हें किया करें॥२१॥
उत्कृष्टायाभिरूपाय वराय सदृशाय च।
अप्राप्तामपि तां तस्मै कन्यां दद्याद् यथाविधिः ॥१॥
विवाहप्रकरणम् १४१
काममाममरणात् तिष्ठेद् गृहे कन्यर्तुमत्यपि।
न चैवैनां प्रयच्छेत्तु गुणहीनाय कर्हिचित्॥२॥
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत कुमार्यृतुमती सती।
ऊर्ध्वं तु कालादेतस्माद् विन्देत सदृशं पतिम्॥३॥
अर्थ:-यदि माता-पिता कन्या का विवाह करना चाहें
तो अति उत्कृष्ट शुभगुण-कर्म-स्वभाववाले, कन्या के सदृश
रूपलावण्यादि गुणयुक्त वर ही को चाहें वह कन्या माता की
छह पीढ़ी के भीतर भी हो, तथापि उसी को कन्या देना अन्य
को कभी न देना कि जिससे दोनों अति प्रसन्न होकर गृहाश्रम
की उन्नति और उत्तम सन्तानों की उत्पत्ति करें॥१॥
चाहे मरण-पर्यन्त कन्या पिता के घर में बिना विवाह के
बैठी भी रहे, परन्तु गुणहीन असदृश, दुष्ट पुरुष के साथ कन्या
का विवाह कभी न करे और वर-कन्या भी अपने-आप स्वसदृश
के साथ ही विवाह करें॥२॥
जब कन्या विवाह करने की इच्छा करे तब रजस्वला होने
के दिन से तीन वर्ष को छोड़के चौथे वर्ष में विवाह करे॥३॥
प्रश्न- 'अष्टवर्षा भवेद् गौरी नववर्षा च रोहिणी।'
इत्यादि श्लोकों की क्या गति होगी?
उत्तर- इन श्लोकों और इनके माननेवालों की दुर्गति,
अर्थात् जो इन श्लोकों की रीति से बाल्यावस्था में अपने सन्तानों
का विवाह कर-करा, उनको नष्ट-भ्रष्ट, रोगी, अल्पायु करते हैं,
वे अपने कुल का जानो सत्यानाश कर रहे हैं। इसलिए यदि
शीघ्र विवाह करें तो वेदारम्भ में लिखे हुए सोलह वर्ष से न्यून
कन्या और पच्चीस वर्ष से न्यून पुरुष का विवाह कभी न करें-
करावें। इसके आगे जितना अधिक ब्रह्मचर्य रक्खेंगे, उतना ही
उनको आनन्द अधिक होगा।
प्रश्न-विवाह निकटवासियों से अथवा दूरवासियों से