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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 253

गृहाश्रमप्रकरणम् २४९
हे सभ्य सभा के योग्य सभापते राजन्! तू (मे) मेरी
(सभाम्) सभी की (पाहि) रक्षा और उन्नति किया कर। (ये
च) और जो (सभ्याः) सभा के योग्य धार्मिक, आप्त (सभासदः)
सभासद्, विद्वान् लोग हैं वे भी सभा की योजना, रक्षा और
उससे सबकी उन्नति किया करें॥२॥
जो (राजाना) राजा और प्रजा के भद्र पुरुषों के दोनों
समुदाय हैं, वे (विदथे) उत्तम ज्ञान और लाभदायक इस जगत्
अथवा संग्रामादि कार्यों में (त्रीणि) राजसभा, धर्मसभा और
विद्यासभा, अर्थात् विद्यादि व्यवहारों की वृद्धि के लिए ये तीन
प्रकार की (सदांसि) सभा नियत करें। इन्हीं से संसार की सब
प्रकार उन्नति करें॥३॥
अनाम्नातेषु धर्मेषु कथं स्यादिति चेद्भवेत्।
यं शिष्टा ब्राह्मणा ब्रूयुस्स धर्मः स्यादशङ्कितः॥१॥
धर्मेणाधिगतो यैस्तु वेदः सपरिबृंहणः।
ते शिष्टा ब्राह्मणा ज्ञेयाः श्रुतिप्रत्यक्षहेतवः॥२॥
अर्थः—हे गृहस्थ लोगो! जो धर्मयुक्त व्यवहार मनुस्मृति
आदि में प्रत्यक्ष न कहे हों यदि उनमें शङ्का होवे तो तुम जिसको
शिष्ट, आप्त विद्वान् कहें, उसी को शङ्कारहित कर्त्तव्य धर्म
मानो॥१॥
शिष्ट सब मनुष्यमात्र नहीं होते, किन्तु जिन्होंने पूर्ण ब्रह्मचर्य
और धर्म से साङ्गोपाङ्ग वेद पढ़ें हों, जो श्रुतिप्रमाण और प्रत्यक्षादि
प्रमाणों ही से विधि वा निषेध करने में समर्थ, धार्मिक, परोपकारी
हों, वे ही शिष्ट पुरुष होते हैं॥२॥
दशावरा वा परिषद् यं धर्मं परिकल्पयेत्।
त्र्यवरा वापि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत्॥३॥
त्रैविद्यो हेतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः।
त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत् स्याद् दशावरा॥४॥