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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 252

२४८ संस्कारविधिः
न देकर धर्म का सञ्चय धीरे-धीरे किया करे ॥ २ ॥
जो मनुष्य अपने कुल को उत्तम करना चाहे, वह नीच-
नीच पुरुषों का सम्बन्ध छोड़कर नित्य अच्छे-अच्छे पुरुषों से
सम्बन्ध बढ़ाता जावे ॥ २३ ॥
जिस वाणी में सब व्यवहार निश्चित, वाणी ही जिनका
मूल और जिस वाणी ही से सब व्यवहार सिद्ध होते हैं, जो
मनुष्य उस वाणी को चोरता, अर्थात् मिथ्याभाषण करता है,
वह जानो सब चोरी आदि पाप ही को करता है। इसलिए
मिथ्याभाषण को छोड़के सदा सत्यभाषण ही किया करे ॥ २४ ॥
मनुष्यों को चाहिए कि धर्म से वेदादि शास्त्रों का पठन-
पाठन, गायत्री-प्रणवादि का अर्थविचार, ध्यान, अग्निहोत्रादि
होम, कर्मोपासना, ज्ञान=विद्या, पौर्णमास्यादि इष्टि, पञ्चमहायज्ञ,
अग्निष्टोम आदि, न्याय से राज्यपालन, सत्योपदेश और योगाभ्यासादि
उत्तम कर्मों से इस शरीर को ब्राह्मी, अर्थात् ब्रह्मसम्बन्धी
करें ॥ २५ ॥
अथ सभास्वरूप लक्षणम्—जो-जो विशेष बड़े-बड़े
काम हों जैसाकि राज्य, वे सब सभा से निश्चय करके किये
जावें। इसमें प्रमाण—
तं सभा॑ च॒ समि॑तिश्च॒ सेना॑ च॒ ॥ १ ॥
—अथर्व० कां० १५। सू० ९। मं० २॥
सभ्य॑ स॒भां मे॑ पाहि॒ ये च॒ सभ्या॑ः सभासद॑ः ॥ २ ॥
—अथर्व० कां० १९। सू० ५५। मं० ६॥
त्रीणि॑ राजाना वि॒दथे॑ पु॒रूणि॒ परि॑ वि॒श्वा॑नि भूषथः
सदां॑सि ॥ ३ ॥ —ऋ० मं० ३। सू० ३८। मं० ६॥
अर्थ- (तम्) जोकि संसार में धर्म के साथ राज्यपालनादि
किया जाता है, उस व्यवहार को सभा और संग्राम तथा सेना
सब प्रकार सञ्चित करे ॥ १ ॥