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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

विवाहप्रकरणम् १५९
हुए पश्चात् पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे वधू-वर पुरोहित और
कार्यकर्त्ता आघारावाज्यभागाहुति चार घी की देवें। तत्पश्चात्
पृ० ३२-३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार घी की और
पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे अष्टाज्याहुति आठ, ये सब मिलके
१६ सोलह आज्याहुति देके प्रधान होम का प्रारम्भ करें।
प्रधान होम के समय वधू अपने दक्षिण हाथ को वर के
दक्षिण स्कन्धे पर स्पर्श करके पृ० ३४ में लिखे प्रमाणे (ओम्
भूर्भुवः स्वः। अग्न आयूंषि०) इत्यादि चार मन्त्रों से, अर्थात्
एक-एक से एक-एक मिलके चार आज्याहुति क्रम से करें
और—
ओं भूर्भुव॒: स्व॒:। त्वम॑र्य॒मा भ॑वसि॒ यत्क॒नीनां॒ नाम॑
स्व॒धाव॑न्गुह्यं॑ बिभर्षि। अ॒ञ्जन्ति॑ मि॒त्रं सुधि॑तं॒ न
गोभि॒र्यद्दम्प॑ती सम॑नसा कृ॒णोषि॒ स्वाहा॑ ॥ इदमग्नये—
इदन्न मम ॥
इस मन्त्र को बोलके पाँचवीं आज्याहुति देनी। तत्पश्चात्—
ओम् ऋ॒ताषाड् ऋ॒तधा॑मा॒ग्निर्ग॑न्ध॒र्वः। स न॑ इदं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं
पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ॥ इदमृताषाहे ऋतधाम्नेऽग्नये
गन्धर्वाय—इदन्न मम ॥ १ ॥
ओम् ऋ॒ताषाड् ऋ॒तधा॑मा॒ग्निर्ग॑न्ध॒र्वस्तस्यौषधयोऽप्स॒रसो॑
मुदो॒ नाम॑। ताभ्य॒: स्वाहा॑ ॥ इदमोषधिभ्योऽप्सरोभ्यो
मुद्भ्यः—इदन्न मम ॥ २ ॥
ओं सं॒हितो वि॒श्वसा॑मा॒ सूर्यो॑ गन्ध॒र्वः। स न॑ इदं ब्रह्म॑
क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ॥ इदं संहिताय विश्वसाम्ने
सूर्याय गन्धर्वाय—इदन्न मम ॥ ३ ॥