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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 162, कुल 318 में से

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पृष्ठ 162

१५८ संस्कारविधिः
ओं भूर्भुवः स्वः। सा नः पूषा शिवतमामैरय सा न ऊरू
उशती विहर। यस्यामुशन्तः प्रहराम शेफं यस्यामु कामा बहवो
निविष्ट्यै॥
इन दो मन्त्रों को वर बोलके, दोनों वर-वधू यज्ञकुण्ड की
प्रदक्षिणा करके, कुण्ड के पश्चिम भाग में प्रथम स्थापन किये
हुए आसन पर पूर्वाभिमुख वर के दक्षिण-भाग में वधू और
वधू के वाम-भाग में वर बैठके, वधू—
ओं प्र मे पतियानः पन्था कल्पताथं शिवा अरिष्टा
पतिलोकं गमेयम्॥
इस मन्त्र को बोले।
तत्पश्चात् पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड के समीप
दक्षिणभाग में उत्तराभिमुख पुरोहित की स्थापना करनी। तत्पश्चात्
पृष्ठ २९ में लिखे प्रमाणे (ओम् अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा)
इत्यादि तीन मन्त्रों में प्रत्येक मन्त्र से एक-एक आचमन, वैसे
तीन आचमन वर-वधू और पुरोहित और कार्यकर्त्ता करके, हस्त
और मुख-प्रक्षालन एक शुद्धपात्र में करके दूर रखवा दें। हाथ
और मुख पोंछके पृ० ३० में लिखे प्रमाणे यज्ञकुण्ड में (ओं
भूर्भुवः स्वद्यौरिव०) इस मन्त्र से अग्न्याधान पृ० ३१ में लिखे
प्रमाणे (ओम् अयन्त इध्म०) इत्यादि मन्त्रों से समिदाधान और
पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे (ओम् अदितेऽनुमन्यस्व) इत्यादि तीन
मन्त्रों से कुण्ड के तीन ओर और (ओं देव सवितः प्रसुव०)
इस मन्त्र से कुण्ड की चारों ओर दक्षिण हाथ की अञ्जलि
से शुद्ध जल सेचन करके, कुण्ड में डाली हुई समिधा प्रदीप्त
को उत्पन्न करनेहारी (देवृकामाः) देवर की कामना करती हुई,
अर्थात् नियोग की भी इच्छा करनेहारी, (स्योना) सुखयुक्त होके
(नः) हमारे (द्विपदे) मनुष्यादि के लिए (शम्) सुख करनेहारी
(भव) सदा हो, और (चतुष्पदे) गाय आदि पशुओं को भी (शम्)
सुख देनेहारी हो, वैसे ही मैं तेरा पति भी वर्त्ता करूँ॥३॥