सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका
Sankhya Darshan & Samkhyakarika
महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)
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मिट्टी से घड़ा बनता है ) नहीं हो सकते; इस कारण शरीर को
सिर्फ पार्थिव ( पृथ्वी से बना हुआ ) ही मानना चाहिये, और
जो अग्नि आदि चार भूत इसमें कहे जाते हैं वे सिर्फ नाम-
मात्र को ही हैं । कोई-कोई स्थूल शरीर को ही मानते हैं उसका
भी खंडन करते हैं ।
न स्थूलमिति नियम आतिवाहिकस्यापि
विद्यमानत्वात् ॥१०३॥
अर्थ—स्थूल शरीर ही है, ऐसा कोई नियम भी नहीं है,
क्योंकि आतिवाहिक अर्थात् लिंग शरीर भी मौजूद है । यदि लिंग
शरीर को न माना जाय तो स्थूल शरीर में गमनादि क्रिया ही
नहीं हो सकती । इस बात को तीसरे अध्याय में विस्तार-पूर्वक
कह आये हैं, जैसे—तेल बत्ती रूप से उत्पन्न हुई दीप की
शिखा सम्पूर्ण ( सब ) घर का प्रकाश कर देती है, इसी तरह
लिंग शरीर भी स्थूल शरीर को अनेक व्यापारों में लगाता है,
और इस बात को भी पहले कह आये हैं कि इंद्रियाँ गोलकों
से अतिरिक्त हैं, इसके साबित करने को ही इंद्रियों की शक्ति
कहते हैं ।
नाप्राप्त प्रकाशकत्वमिन्द्रियाणाम प्राप्तेः सर्व-
प्राप्तेर्वा ॥ १०४ ॥
अर्थ—जिस पदार्थ का इन्द्रियों से कोई भी सम्बन्ध नहीं
है उसको इन्द्रियाँ प्रकाश नहीं कर सकतीं । यदि कर्म करती हैं तो
देशान्तर ( दूसरी जगह ) में रक्खी कोई वस्तु का भी प्रकाश
करना सिद्ध हो जायगा ; परन्तु ऐसी बात न तो नेत्रों से देखी
और न कानों से सुनी । इस सूत्र का स्पष्ट भाव यह है कि
इन्द्रियाँ उसी पदार्थ को प्रकाश कर सकती हैं जिससे उनका