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सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

सांख्य दर्शन / सांख्यकारिका

Sankhya Darshan & Samkhyakarika

महर्षि कपिल / ईश्वरकृष्ण द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 192 में से

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पृष्ठ 138

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प्रत्यक्षवादी चार्वाक नास्तिक का मत पुष्ट हो जायगा, इसवास्ते
ऐसा न मानना चाहिये, कि आधार की स्वरूपशक्ति का ही
नाम व्याप्ति है। अब इस बात का निश्चय करते हैं, कि आचार्य
और पंचशिख नामक आचार्य के मत में भेद है या नहीं। क्योंकि
पंचशिख नाम वाला आचार्य तो आधार ( आग ) में आधेय
( धुवें ) की शक्ति होने को व्याप्ति मानता है ; और आचार्य
मुनि कपिलजी व्याप्त आग की शक्ति से उत्पन्न हुये सिीक
विशेष शक्ति को दूसरा पदार्थ मानकर उसको व्याप्ति मानते हैं।
इन दोनों में से कौन सत्य है ?
आधेय शक्ति सिद्धौ निज शक्ति योगः समा-
नन्यायात् ॥ ३६ ॥
अर्थ—समानन्याय अर्थात् बराबर युक्ति होने से जैसेकि
आधेय-शक्ति की सिद्धि होती है वैसे ही निज-शक्तियोग की, यह
आचार्यों का मत भी सत्य है। दोनों में से कोई भी युक्ति हीन
नहीं मानते हैं। यह व्याप्ति का झगड़ा केवल इसी वास्ते उत्पन्न
किया गया था कि गुण आदि स्वरूप से नाशवान नहीं है। इस
पक्ष की पुष्टि करने के वास्ते आचार्य को अनुमान प्रमाण की
आवश्यकता हुई और वह अनुमान प्रमाण पंचावयव के बिना
नहीं हो सकता था, इस वास्ते उनको लिखन पड़ा। इसी निश्चय
में पंचावयव के अन्तर्गत एक साहचर्य नियम जिसका दूसरा नाम
व्याप्ति आन पड़ा उसको प्रकाश करने के वास्ते यह कहकर
अपने पक्ष को पुष्ट कर लिया। अब इससे आगे पंचावयव रूप
शब्द को ज्ञान की उत्पत्ति में हेतु सिद्ध करने के वास्ते शब्द की
शक्तियों का प्रकाश करके उस शब्द-प्रमाण में बाधा डालने वालों
के मत का खण्डन करते हैं—