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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 226 में से

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पृष्ठ 75

अध्याय - 3
जीवो परिणामयदे पोग्गलदव्वाणि कम्मभावेण।
ते सयमपरिणमंते कहं तु परिणामयदि चेदा॥ (3-50-118)
अह सयमेव हि परिणमदि कम्मभावेण पोग्गलं दव्वं।
जीवो परिणामयदे कम्मं कम्मत्तमितिमिच्छा॥ (3-51-119)
नियमा कम्मपरिणदं कम्मं चिय होदि पोग्गलं दव्वं।
तह तं णाणावरणाइपरिणदं मुणसु तच्चेव॥ (3-52-120)
यह पुद्गल द्रव्य जीव में स्वयं नहीं बँधा है और कर्मभाव से स्वयं परिणमन नहीं
करता है - यदि ऐसा मानो, तब तो वह अपरिणामी हो जाएगा। अथवा कार्मण
वर्गणाएँ द्रव्यकर्मरूप से परिणमन नहीं करतीं - ऐसा मानो तो संसार के अभाव का
प्रसंग आ जाएगा अथवा सांख्यमत का प्रसंग आ जाएगा।
जीव पुद्गल द्रव्यों को कर्मभाव से परिणमन कराता है - यदि ऐसा मानो तो जीव
उन्हें किस प्रकार परिणमन करा सकता है, जबकि वे पुद्गल द्रव्य स्वयं परिणमन
नहीं करते; अथवा यह मानो कि पुद्गल द्रव्य स्वयं ही कर्मभाव से परिणमन करता
है तो जीव कर्मरूप पुद्गल को कर्मरूप परिणमन कराता है - यह कहना मिथ्या
सिद्ध होता है। इसलिए जैसे नियम से कर्मरूप (कर्त्ता के कार्यरूप से) परिणत
पुद्गल द्रव्य कर्म ही है, इसी प्रकार ज्ञानावरणादि रूप परिणमित पुद्गल द्रव्य
ज्ञानावरणादि ही है; ऐसा जानो।