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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 186, कुल 226 में से

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पृष्ठ 186

अध्याय - 10
जह सेडिया दु ण परस्स सेडिया सेडिया य सा होदि।
तह संजदो दु ण परस्स संजदो संजदो सो दु॥
(10-51-358)
जह सेडिया दु ण परस्स सेडिया सेडिया य सा होदि।
तह दंसणं दु ण परस्स दंसणं दंसणं तं तु॥
(10-52-359)
जैसे सफेदी-खड़िया पर की (दीवाल आदि रूप) नहीं है, सफेदी वह तो सफेदी ही
है (वह अपने स्वरूप में ही रहती है); उसी प्रकार ज्ञायक (आत्मा) पर का
(ज्ञेयरूप) नहीं है। ज्ञायक वह तो ज्ञायक ही है (पर को जानता हुआ भी अपने
स्वरूप में रहता है)।
जैसे सफेदी-खड़िया पर की नहीं है, सफेदी वह तो सफेदी ही है; उसी प्रकार दर्शक
(आत्मा) पर का नहीं है, दर्शक (दृष्टा) वह तो दर्शक ही है।
जैसे सफेदी-खड़िया पर की नहीं है, सफेदी वह तो सफेदी ही है; उसी प्रकार संयत
(आत्मा) पर का (परिग्रहादि रूप) नहीं है। संयत वह तो संयत ही है।
जैसे सफेदी-खड़िया पर की (दीवाल आदि रूप) नहीं है, सफेदी वह तो सफेदी ही
है; उसी प्रकार दर्शन (श्रद्धान) पर का नहीं है। दर्शन वह तो दर्शन ही है।
Just as chalk, when applied to a board etc., does not become one
with that board etc., but retains its own identity characterized
by whiteness, similarly, the knower Self, while knowing an
object, does not become one with that known object, but retains
his own identity as a knower.
Just as chalk does not become one with an alien substance, but
retains its own identity characterized by whiteness, similarly,
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