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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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पृष्ठ 114

अध्याय - 7
राग पुद्गलकर्म है। उसके फलस्वरूप उदय से उत्पन्न यह रागरूप भाव है। यह तो
मेरा भाव नहीं है। मै तो एक टंकोत्कीर्ण ज्ञायक भाव हूँ।
सम्यग्दृष्टि ज्ञानवैराग्य सम्पन्न होता है -
एवं सम्मादिट्ठी अप्पाणं मुणदि जाणगसहावं।
उदयं कम्मविवागं च मुयदि तच्चं वियाणंतो॥ (7-8-200)
पूर्वोक्त प्रकार से सम्यग्दृष्टि अपने-आपको (टंकोत्कीर्ण) ज्ञायक स्वभाव जानता है
और आत्मतत्त्व को जानता हुआ कर्मोदय के विपाक से उत्पन्न भावों को छोड़ देता
है।
रागी जीव सम्यग्दृष्टि नहीं है -
परमाणुमेत्तयं पि हु रागादीणं तु विज्जदे जस्स।
ण वि सो जाणदि अप्पाणयं तु सव्वागमधरो वि॥
(7-9-201)
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