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समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

समयसार (प्राकृत गाथा एवं हिन्दी-अंग्रेजी व्याख्या)

Samayasara of Acharya Kundakunda with Hindi Commentary

आचार्य कुन्दकुन्द / अमृतचन्द्र सूरि द्वारा

DevanagariHindipublished226 पृष्ठ

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अध्याय - 7
नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष भी द्रव्यों के उपभोग में विरक्त रहता हुआ
(वैराग्य की सामर्थ्य से) कर्मों से नहीं बँधता।
ज्ञानी और अज्ञानी में अन्तर -
सेवंतो वि ण सेवदि असेवमाणो वि सेवगो को वि।
पगरणचेट्ठा कस्स वि ण य पायरणो त्ति सो होदि॥
(7-5-197)
कोई सम्यग्दृष्टि (रागादि भाव के अभाव के कारण) विषयों का सेवन करता हुआ
भी उनका सेवन नहीं करता, (और अज्ञानी विषयों में रागभाव के कारण) उन्हें
सेवन न करता हुआ भी सेवन करने वाला होता है। जैसे - किसी पुरुष की
कार्यसम्बन्धी क्रिया होती है, किन्तु वह कार्य करने वाला नहीं होता।
विशेष - जैसे कोई मुनीम सेठ की ओर से व्यापार का सब कार्य करता है, किन्तु
उस व्यापार तथा उसकी लाभ-हानि का वह स्वामी नहीं होता। इसी प्रकार
सम्यग्दृष्टि भोगों का सेवन करता हुआ भी राग न होने के कारण उसका असेवक है
और मिथ्यादृष्टि सेवन न करता हुआ भी राग के सद्भाव के कारण उसका सेवक है।
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