रुद्रयामल तन्त्र (उत्तर तन्त्र - हिन्दी व्याख्या सहित)
Rudrayamala Tantra (Uttara Tantra) with Hindi Commentary
भगवान भैरव / पं. रामचरण शर्मा द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दीटीकासहितम् ३१
व्याधिकरणम् ।
भल्लातकं च गुंजा च अर्नि समभागकान् ॥
यस्योपरि क्षिपेच्चैव सोपि कुष्ठीभवेत्तदा ॥
शर्करादुग्धपानेन मुक्तरोगोऽभिजायते ॥ ३१ ॥
भिलावा गुंजा अरनी ये बराबर ले जिसके ऊपर छोडे सो कुष्ठी
होय और शर्करा दुग्ध पीवे तो रोगसे छूटे ॥३१॥
केंवाचबीजं कृष्णं च शतावरीं समानयेत् ॥ ३२ ॥
गुंजां समानभागां च चैकत्र सहमर्दयेत् ॥
यस्यांगे च क्षिपेच्चैव पामारोगो भवेत्तदा ॥ ३३ ॥
कृष्ण केवाछबीज और शतावरि और इनके बराबर गुंजा ले एकत्र
करके मर्दन कर जिसके अंगमें लगा दे उसके अंगमें खुजली पडे ॥३२॥३३॥
माषे चन्दनपूगौ च रक्तचंदनवारिणा ॥
तस्य लेपनमात्रेण पामारोगो विनश्यति ॥ ३४ ॥
उर्द चंदन और सुपारी रक्तचंदनके जलमें मिलाकर लगा दे तो नीका
होय ॥ ३४ ॥
मंत्रः । ॐ नमो भगवते रुद्राय उंडासारेसु-
राय अमुकरोगे न ग्रह न ग्रह नपत्रप च
ताडय ताडय किलेदंह फट ठः ठः ॥
शतावरीसमुत्खारं कोविदारस्य मूलकम् ॥
एकत्र कृत्वा मर्दयेद्भोजनाद्याति दास्यताम् ॥ ३५ ॥
शतावरि, समुद्रखार और कदपलको एकत्र मर्दन कर खिलावे तो
दास होय ॥३५॥