सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 677, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 677

यो मर्त्येष्वमृत ऋतावा देवो देवेष्वरतिर्निधायि.
होता यजिष्ठो महा शुचध्यै हव्यैरग्निर्मनुष ईरयध्यै.. (१)
जो मरणरहित एवं दिव्य अग्नि मनुष्यों में सत्ययुक्त, इंद्रादि देवों के शत्रुओं को हराने
वाले, देवों को बुलाने वाले एवं सबसे अधिक यज्ञकर्त्ता हैं, वे अपने महान् तेज से दीप्त होने
एवं यजमानों को स्वर्ग भेजने के लिए उत्तर वेदी पर स्थापित किए गए हैं. (१)
इह त्वं सूनो सहसो नो अद्य जातो जाताँ उभयाँ अन्तरग्ने.
दूत ईयसे युयुजान ऋष्व ऋजुमुष्कान्वृषणः शुक्रांश्च.. (२)
हे बल के पुत्र एवं दर्शनीय अग्नि! तुम आज हमारे यज्ञ में उत्पन्न हुए हो एवं अपने
सीधे, मोटे, तेजस्वी तथा शक्तिशाली घोड़ों को रथ में जोतकर नभ से भिन्न देवों और मनुष्यों
के बीच हव्य वहन के लिए दूत बनते हो. (२)
अत्या वृधस्नू रोहिता घृतस्नू ऋतस्य मन्ये मनसा जविष्ठा.
अन्तरीयसे अरुषा युजानो युष्मांश्च देवान्विश आ च मर्तान्.. (३)
हे सत्यरूप अग्नि! मैं तुम्हारे लाल रंग वाले, मन से भी अधिक वेगशाली एवं अन्न तथा
जल बरसाने वाले घोड़ों की स्तुति करता हूं. उन तेजस्वी घोड़ों को रथ में जोतकर यज्ञ के
पात्र देवों एवं सेवा करने वाले मनुष्यों के बीच भली-भांति जाते हो. (३)
अर्यमणं वरुणं मित्रमेषामिन्द्राविष्णू मरुतो अश्विनोत.
स्वश्वो अग्ने सुरथः सुराधा एदु वह सुहविषे जनाय.. (४)
हे उत्तम अश्वों, उत्तम रथ एवं उत्तम धन वाले अग्नि! तुम उत्तम हवि वाले यजमान के
लिए अर्यमा, वरुण, मित्र, इंद्र विष्णु, मरुद्गण एवं अश्विनीकुमारों को बुलाओ. (४)
गोमाँ अग्नेऽविमाँ अश्वी यज्ञो नृवत्सखा सदमिदप्रमृष्यः.
इळावाँ एषो असुर प्रजावान्दीर्घो रयिः पृथुबुध्नः सभावान्.. (५)
हे शक्तिशाली अग्नि! हमारा यह यज्ञ गाय, भेड़ एवं घोड़ों से युक्त हो. अध्वर्यु एवं
यजमान वाला यज्ञ सदैव नष्ट न करने योग्य, हव्य अन्न से युक्त, पुत्र-पौत्र आदि सहित,
लगातार चलने वाला, धनपूर्ण, अनेक संपत्तियों का कारण तथा उपदेशकत्र्ताओं से भरा हो.
(५)
यस्त इध्मं जभरत्सिष्विदानो मूर्धानं वा ततपते त्वाया.
भुवस्तस्य स्वतवाँः पायुरग्ने विश्वस्मात्सीमघायत उरुष्य.. (६)
हे अग्नि! जो मनुष्य पसीना बहाकर तुम्हारे लिए लकड़ियां ढोकर लाता है एवं तुम्हें
पाने की अभिलाषा से अपना सर लकड़ी के बोझे से दुःखी करता है, उसे तुम धनशाली