सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 676, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 676

ते मन्वत प्रथमं नाम धेनोस्त्रिः सप्त मातुः परमाणि विन्दन्.
तज्जानतीरभ्यनूषत व्रा आविर्भूवदरुणीर्यशसा गोः.. (१६)
हे अग्नि! स्तुति करने वाले अंगिराओं ने माता वाणी से संबंधित एवं स्तुति में सहायक
शब्दों को पहले जाना. बाद में स्तुतिसंबंधी इक्कीस छंदों का ज्ञान प्राप्त किया. इसके पश्चात्
सबको जानती हुई उषा की स्तुति की. फिर सूर्य के तेज से अरुण वर्ण की उषा उत्पन्न हुई.
(१६)
नेशत्तमो दुधितं रोचत द्यौरुद्देव्या उषसौ भानुरर्त.
आ सूर्यो बृहतस्तिष्ठदज्राँ ऋजु मर्तेषु वृजिना च पश्यन्.. (१७)
उषा की प्रेरणा से रात का अंधकार नष्ट हुआ एवं आकाश चमकने लगा. इसके बाद
उषा का प्रकाश उत्पन्न हुआ. मनुष्यों के सत् एवं असत् कर्मों को देखते हुए सूर्य महान् पर्वत
के ऊपर पहुंच गए. (१७)
आदित्पश्चा बुबुधाना व्यख्यन्नादिद्रत्नं धारयन्त द्युभक्तम्.
विश्वे विश्वास्तु दुर्यासु देवा मित्र धिये वरुण सत्यमस्तु.. (१८)
अंगिराओं ने सूर्योदय के बाद पणियों द्वारा चुराई गई गायों को जानते हुए पीछे से उन
गायों को भली-भांति देखा एवं देवों द्वारा दिए गए गोरूप धन को पाया. अंगिराओं के सभी
घरों में सभी देव पधारे. हे मित्रतुल्य एवं वरुण के रोगों का नाश करने वाले अग्नि! यजमान
को सत्य फल प्राप्त हो. (१८)
अच्छा वोचेय शुशुचानमग्निं होतारं विश्वभरसं यजिष्ठम्.
शुच्यूधो अतृणन्न गवामन्धो न पूतं परिषिक्तमंशोः.. (१९)
अत्यंत दीप्तिशाली, देवों को बुलाने वाले, विश्व के पोषक एवं सबसे अधिक यज्ञकर्त्ता
अग्नि को लक्ष्य करके हम स्तुतियां बोलते हैं. यजमान तुम्हारी आहुति के निमित्त गायों के
थनों से पवित्र दूध का दोहन एवं सोमरसरूपी अन्न को पवित्र करते हुए घर में क्षेपण न करके
केवल स्तुति ही बोलते हैं. (१९)
विश्वेषामदितिर्यज्ञियानां विश्वेषामतिथिर्मानुषाणाम्.
अग्निद्देवानांमव आवृणानः सुमृळीको भवतु जातवेदाः.. (२०)
अग्नि सभी यज्ञ योग्य देवों की माता के समान पोषक एवं सभी मनुष्यों के लिए अतिथि
के समान पूज्य हैं. स्तोताओं का अन्न भक्षण करने वाले एवं सर्वज्ञ अग्नि सुखदाता हों. (२०)
सूक्त-२ देवता—अग्नि
ebook converter DEMO Watermarks*