सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 399

इमे वां सोमा अप्स्वा सुता इहाध्वर्युभिर्भरमाणा अयंसत वायो शुक्रा अयंसत.
एते वामभ्यसृक्षत तिरः पवित्रमाशवः युवायवोऽति रोमाण्याव्यया सोमासो अत्यव्यया..
(६)
हे वायु! हमारे यज्ञ में निचोड़ा गया और अध्वर्युजनों द्वारा धारण किया हुआ उज्ज्वल
सोम निश्चय ही तुम दोनों का है. तिरछे बिछे हुए कुशों पर रखा हुआ पर्याप्त सोमरस तुम्हारा
है. वह समस्त देवों को लांघकर प्रचुर मात्रा में तुम्हें मिलता है. (६)
अति वायो ससतो याहि शश्वतो यत्र ग्रावा वदति तत्र गच्छतं गृहमिन्द्रश्च गच्छतम्.
वि सूनृता ददृशे रीयते घृतमा पूर्णया नियुता याथो अध्वरमिन्द्रश्च याथो अध्वरम्.. (७)
हे वायु! आलस्य के कारण सोते हुए यजमानों को लांघ कर हमारे इस यज्ञ में आओ,
जहां सोमरस कूटने के लिए पत्थरों का शब्द उत्पन्न हो रहा है. इंद्र भी ऐसा ही करें. जहां
प्यारी और तथ्यपूर्ण स्तुतियां हो रही हैं, जहां होम के निमित्त घी ले जाया जा रहा है, अपने
नियुत नामक घोड़ों के साथ वहीं यज्ञस्थल में जाओ. (७)
अत्राह तद्द्वहेथे मध्व आहुतिं यमश्वत्थमुपतिष्ठन्त जायवोऽस्मे ते सन्तु जायवः.
साकं गावः सुवते पच्यते यवो न ते वाय उप दस्यन्ति धेनवो नाप दस्यन्ति धेनवः..
(८)
हे इंद्र और वायु! तुम हमारे यज्ञ में मधु के समान आहुति को स्वीकार करो. सोम को
प्राप्त करने के लिए विजयी यजमान पर्वतीय प्रदेशों में जाते हैं. हमारे ऋत्विज् तुम्हारा
यज्ञकर्म करने में समर्थ हों. इस यज्ञ में बहुत सी गाएं तुम्हारे निमित्त एक साथ बहुत सा दूध
देती हैं एवं पुरोडाश पकाया जाता है. ये गाएं न कम हों और न दुबली हों. (८)
इमे ये ते सु वायो बाह्वोजसोऽन्तर्नदी ते पतयन्त्युक्षणो महिव्राधन्त उक्षणः.
धन्वञ्चिद्ये अनाशवो जीराश्चिदगिरौकसः.
सूर्यस्येव रश्मयो दुर्नियन्तवो हस्तयोर्दुर्नियन्तवः.. (९)
हे उत्तम फलदाता वायु! तुम्हारे परम बलशाली, अत्यंत मोटे-ताजे एवं जवान बैलों जैसे
घोड़े तुम्हें धरती और आकाश के मध्य भाग से यज्ञस्थल में लाते हैं एवं देर नहीं करते. ये
अत्यंत शीघ्रता से चलते हैं. सूर्यकिरणों के समान इनकी चाल भी नहीं रुकती. (९)
सूक्त—१३६ देवता—मित्र एवं वरुण
प्र सु ज्येष्ठं निचिरभ्यां बृहन्नमो हव्यं मतिं भरता मृळयद्भ्यां स्वादिष्ठं मृळयद्भ्याम्.
ता सम्राजा घृतासुती यज्ञेयज्ञ उपस्तुता.
अथैनोः क्षत्रं न कुतश्चनाधृषे देवत्वं नू चिदाधृषे.. (१)
ebook converter DEMO Watermarks*