सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 398, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 398

जो हमने बिछे हुए कुशों पर रखा है. तुम नियुत नामक अश्वों के स्वामी हो. सब देवता चुप हैं.
तुमसे पहले कोई सोमरस नहीं पी रहा. निचोड़े हुए सोम को तुम्हारे आनंद एवं हमारी
यज्ञसिद्धि के निमित्त तैयार किया गया है. (१)
तुभ्यायं सोमः परिपूतो अद्रिभिः स्पार्हा वसानः परि कोशमर्षति शुक्रा वसानो अर्षति.
तवायं भाग आयुषु सोमो देवेषु हूयते.
वह वायो नियुतो याह्यस्मयुर्जुषाणो याह्यस्मयुः.. (२)
हे वायु! पत्थरों द्वारा पीसा गया, सबके द्वारा अभिलाषा करने योग्य एवं तेजस्वी
सोमरस पात्र में आता है एवं निर्मल प्रकाश से युक्त होकर तुम्हें प्राप्त होता है. मनुष्यों में सोम
यज्ञ के योग्य है. वही सब देवों के मध्य तुम्हें दिया जाता है. तुम हमारे यज्ञ में आने के लिए
रथ में नियुत अश्व जोतकर प्रस्थान करो एवं हमारे ऊपर अनुग्रह करो. (२)
आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वरं सहस्रिणीभिरुप याहि वीतये वायो हव्यानि वीतये.
तवायं भाग ऋत्वियः सरश्मिः सूर्ये सचा.
अध्वर्युभिर्भरमाणा अयंसत वायो शुक्रा अयंसत.. (३)
हे वायु! तुम नियुत नामक सैकड़ों और हजारों घोड़ों से अपनी इच्छा पूर्ति और हव्य
भक्षण के लिए हमारे यज्ञ में आओ. ऋत्विज् द्वारा अपने हाथ से निर्मित पवित्र एवं उदित सूर्य
के समान तेजस्वी सोम तुम्हारा भाग है. (३)
आ वां रथो नियुत्वान्वक्षदवसेऽभि प्रयांसि सुधितानि वीतये वायो हव्यानि वीतये.
पिबतं मध्वो अन्धसः पूर्वपेयं हि वां हितम्.
वायवा चन्द्रेण राधसा गतमिन्द्रश्च राधसा गतम्.. (४)
हे वायु! नियुत नामक घोड़ों से युक्त रथ तुम्हारे साथ-साथ इंद्र को भी हमारी रक्षा,
हमारे द्वारा गृहीत अन्न के भक्षण एवं अन्य हव्यों को स्वीकारने के लिए यज्ञ में लावें. तुम
दोनों का मधुर सोमरस पिओ. अन्य देवों से पहले तुम्हारा सोमपान करना उचित है. तुम और
इंद्र हमें प्रसन्न करने वाला धन लेकर आओ. (४)
आ वां धियो ववृत्युरध्वरां उपेममिन्दुं मर्मृजन्त वाजिनमाशुमत्यं न वाजिनम्.
तेषां पिबतमस्मयू आ नो गन्तमिहोत्या.
इन्द्रवायू सुतानामद्रिभिर्युवं मदाय वाजदा युवम्.. (५)
हे इंद्र और वायु! हमारे स्तोत्र तुम्हें यज्ञ में आने की प्रेरणा दें. जिस प्रकार तेज चलने
वाले घोड़े की मालिश की जाती है, उसी प्रकार घर से कलश में रखकर यज्ञभूमि में लाए गए
सोम को ऋत्विज् रगड़ते हैं. तुम उनका सोमरस पिओ और हमारे यज्ञ की रक्षा के लिए
पधारो. तुम दोनों अन्न देने वाले हो, इसलिए अपनी तृप्ति के लिए पत्थरों द्वारा पीसे गए सोम
को पिओ. (५)
ebook converter DEMO Watermarks*