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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 357, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 357

का गर्जन बादल के भीतर जल को बताता है. (१२)
अजोहवीन्नासत्या करा वां महे यामन्पुरुभुजा पुरन्धिः.
श्रुतं तच्छासुरिव वध्रिमत्या हिरण्यहस्तमश्विनावदत्तम्.. (१३)
हे लंबे हाथों वाले अश्विनीकुमारो! परम बुद्धिमती ऋषिपत्नी वध्रिमती ने अपने पूजनीय
स्तोत्र में तुम अभिमत फलदाताओं को बार-बार बुलाया था. तुमने शिष्य के समान उसकी
पुकार सुनी एवं उसे हिरण्यहस्त नाम का पुत्र दिया. (१३)
आस्नो वृकस्य वर्तिकामभीके युवं नरा नासत्यामुक्तम्.
उतो कविं पुरुभुजा युवं ह कृपमाणमकृणुतं विचक्षे.. (१४)
हे नेताओ! तुमने वृक और वर्तिका के संग्राम में वृक के मुख से वर्तिका को छुड़ाया था.
तुमने स्तुतिकर्त्ता विद्वान् को देखने की शक्ति दी थी. (१४)
चरित्रं हि वेरिवाच्छेदि पर्णमाजा खेलस्य परितक्म्यायाम्.
सद्यो जङ्घामायसीं विश्पलायै धने हिते सर्तवे प्रत्यधत्तम्.. (१५)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार पक्षी का पंख अलग हो जाता है, उसी प्रकार खेल राजा
की पत्नी विश्पला का पैर युद्ध में कट गया था. तुमने शत्रुओं द्वारा छिपाया हुआ धन प्राप्त
करने के निमित्त चलने के लिए विश्पला के लिए रात भर में लोहे का पैर बनाकर दिया था.
(१५)
शतं मेषान्वृक्ये चक्षदानमृज्राश्वं तं पितान्धं चकार.
तस्मा अक्षी नासत्या विचक्ष आधत्तं दस्रा भिषजावनर्वन्.. (१६)
हे अश्विनीकुमारो! ऋज्राश्व ऋषि ने अपनी वृकी के भोजन के लिए सौ भेड़ों को काट
दिया था. इससे उनके पिता ने उन्हें अंधा कर दिया था. हे देवों के वैद्यो! तुमने ऋज्राश्व की
देखने में असमर्थ दोनों आंखों को देखने में समर्थ बना दिया था. (१६)
आ वां रथं दुहिता सूर्यस्य कार्ष्मेवातिष्ठदर्वता जयन्ती.
विश्वे देवा अन्वमन्यन्त हृद्भिः समु श्रिया नासत्या सचेथे.. (१७)
हे अश्विनीकुमारो! जिस प्रकार दौड़ने वाले घोड़ों में सबसे आगे वाला निश्चित स्थान पर
गड़ी लकड़ी तक पहले पहुंचता है, उसी प्रकार अवधि पर शीघ्र पहुंचने वाले घोड़ों के कारण
सूर्यपुत्री सूर्या तुम्हारे रथ पर बैठ गई. सारे देवों ने सहर्ष यह बात मान ली और तुमने कांति
प्राप्त की. (१७)
यदयातं दिवोदासाय वर्तिर्भरद्वाजायश्विना हयन्ता.
रेवदुवाह सचनो रथो वां वृषभश्च शिंशुमारश्च युक्ता.. (१८)
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