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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 322

करते हैं, वैसे ही अग्नि हमें दुःखों एवं पापों से पार करावें. (१)
सूक्त—१०० देवता—इंद्र
स यो वृषा वृष्ण्येभिः समोका महो दिवः पृथिव्याश्च सम्राट्.
सतीनसत्वा हव्यो भरेषु मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (१)
जो इंद्र कामवर्षी, शक्तिसंपन्न, महान्, आकाश और धरती के ईश्वर, जल बरसाने वाले
तथा संग्राम में स्तुतिकर्त्ताओं द्वारा बुलाने योग्य हैं, वे मरुतों के साथ मिलकर हमारे रक्षक
बनें. (१)
यस्यानप्ताः सूर्यस्येव यामो भरेभरे वृत्रहा शुष्मो अस्ति.
वृषन्तमः सखिभिः स्वेभिरेवैर्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (२)
जिस प्रकार सूर्य की चाल को दूसरा कोई नहीं पा सकता, उसी प्रकार जिनकी गति
दूसरों के लिए अप्राप्य है, जो अपने गतिशील मित्रों-मरुतों के साथ अतिशय कामवर्धक हैं,
जो सभी संग्रामों में शत्रुओं के हंता और शोषक हैं, वे इंद्र मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक
बनें. (२)
दिवो न यस्य रेतसो दुघानाः पन्थासो यन्ति शवसापरीताः.
तरद्द्वेषाः सासहिः पौंस्येभिर्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (३)
जिसकी बलयुक्त एवं दूसरों द्वारा अप्राप्य किरणें सूर्य के समान आकाश में वर्षा के जल
को गिराती हुईं इधर-उधर फैलती हैं, वे ही जितशत्रु एवं शक्ति द्वारा शत्रुओं को पराजित करने
वाले इंद्र मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (३)
सो अङ्गिरोभिरङ्गिरस्तमो भूद्वृषा वृष्णिभिः सखिभिः सखा सन्.
ऋग्मिभिर्ऋग्मी गातुभिर्ज्येष्ठो मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (४)
जो गतिशीलों में अत्यंत तीव्रगति, अभीष्टदाताओं में सर्वोत्तम कामपूरक, मित्रों में परम
हितकारी, अर्चनीयों में सर्वाधिक पूजापात्र एवं स्तुतिपात्रों में सर्वाधिक स्तुति योग्य हैं, वे इंद्र
मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (४)
स सूनुभिर्न रुद्रेभिर्ऋभ्वा नृषाह्ये सासह्वाँ अमित्रान्.
सनीळेभिः श्रवस्यानि तूर्वन्मरुत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती.. (५)
जो रुद्रपुत्र मरुतों की सहायता से महान् बनकर संग्राम में मनुष्यों के शत्रुओं को
पराजित करते हैं एवं अपने सहवासी मरुतों की सहायता से अन्न के कारण जल को बादलों
से नीचे गिराते हैं, वे इंद्र मरुतों के सहयोग से हमारे रक्षक बनें. (५)
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