ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विषो नो विश्वतोमुखाति नावेक पारय. अप नः शोशुचदघम्.. (७)
हे सर्वतोमुख अग्नि! जिस प्रकार नाव से नदी को पार करते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे
कल्याण के लिए हमें शत्रुरहित देश में पहुंचाओ. हमारे पाप नष्ट हों. (७)
स नः सिन्धुमिव नावयाति पर्षा स्वस्तये. अप नः शोशुचदघम्.. (८)
हे अग्नि! जिस प्रकार नाव से नदी को पार करते हैं, उसी प्रकार तुम हमारे कल्याण के
लिए हमें शत्रुरहित देश में पहुंचाकर हमारा पालन करो. हमारे पाप नष्ट हों. (८)
सूक्त—९८ देवता—अग्नि
वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवनानामभिश्रीः.
इतो जातो विश्वमिदं वि चष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण.. (१)
हम पर वैश्वानर अग्नि की अनुग्रहबुद्धि हो. वे सामने से सेवनीय एवं सबके स्वामी हैं. दो
काष्ठों से उत्पन्न होकर अग्नि संसार को देखते हैं एवं प्रातःकाल उदय होते हुए सूर्य से मिल
जाते हैं. (१)
पृष्टो दिवि पृष्टो अग्निः पृथिव्यां पृष्टो विश्वा ओषधीरा विवेश.
वैश्वानरः सहसा पृष्टो अग्निः स नो दिवा स रिषः पातु नक्तम्.. (२)
अग्नि आकाश में सूर्यरूप से तथा धरती पर गार्हपत्यादि रूप से वर्तमान हैं. अग्नि ने
सारी ओषधियों में उन्हें पकाने के लिए प्रवेश किया है. वही हमें दिवस एवं रात्रि में शत्रु से
बचावें. (२)
वैश्वानर तव तत्सत्यमस्त्वस्मान्नायो मघवानः सचन्ताम्.
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः.. (३)
हे वैश्वानर! तुमसे संबंधित यह यज्ञ सफल हो, हमें धन प्राप्त हो एवं अति शीघ्र पुत्र
हमारी सेवा करें. मित्र, वरुण, अदिति, सिंधु, धरती और आकाश हमारे धन की रक्षा करें. (३)
सूक्त—९९ देवता—अग्नि
जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयतो नि दहाति वेदः.
स नः पर्षदति दुर्गाणि विश्वा नावेव सिन्धुं दुरितात्यग्निः.. (१)
हम सब भूतों को जानने वाले अग्नि के निमित्त सोमरस निचोड़ते हैं. अग्नि हमारे प्रति
शत्रुता का व्यवहार करने वालों का धन नष्ट करें. जिस प्रकार नाव की सहायता से नदी पार
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